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दिवस में दिवस-निषेध तंबाकू दिवस

शशि दीपक कपूर
मुंबई (महाराष्ट्र)
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कुछ भी कर लीजिए या कह लीजिए-आज के समय में सभी समझदार प्राणी हैं। कैंसर हॉस्पिटल में लगभग सभी चिकित्सक ही ऑपरेशन करने के बाद आराम करने के समय में हँसी-ठिठोली या आपसी बातचीत में किसी विशेष तथ्य पर चर्चा के दौरान कश पर कश लेते हैं।
बाकी लोगों को क्या समझाना ! इस बारे में केवल उन्हीं को समझाने में हम सभी सफल होते हैं, जो तम्बाकू, सिगरेट व अन्य व्यसनों के आदी नहीं है।
सरकार क्यों नहीं ऐसे पदार्थों को बनाने वाली कंपनियों पर लगाम खींचती या बंद करवाती ? जबकि सबको संज्ञान है; ‘तंबाकू या सिगरेट स्वास्थ्य के लिए एक बेहद ही हानिकारक तत्व है।’
अपने धर्म में तो शिव प्रसाद समझ कर त्यौहारों में मिल-बांट चखने की प्रथा भी खूब मनचली है।
वाह! क्या कहने हैं! हमारी मानव जाति की सामाजिक व धार्मिक व्यवस्था के। समाज जिस तथ्य का विरोध करे, उसी तथ्य को प्रमुख आधार देता है ‘धर्म’, और जिन तथ्यों का सामाजिक पालन करने को धर्म कहता है उसे आज समाज आधुनिक विकसित समाज की परिभाषा में लपेट देता है।
सदियों से चली आ रही ये व्यवस्थाएं कभी भी दुरुस्त नहीं हो सकती। लेखक प्रत्येक वर्ष लिख-लिख कर काले शब्द छाप रहे हैं, और सरकार ‘तम्बाकू स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है’ की संवैधानिक चेतावनी दे दायित्व मुक्त हो जाती है। नवयुवक नई सामाजिक व्यवस्था की आवश्यकता बताकर बिछड़ जाते हैं और हम सब प्रत्येक वर्ष विश्व दिवस मनाने में जुटे जाते हैं। सही कहें तो, अधिकारों और कर्तव्यों के बीच चलती आँख-मिचौनी सच में बहुत ही लुभावनी है।
श्रेष्ठ निर्णय, तम्बाकू व सिगरेट की कंपनियां ही बंद हो जाएं !… तो सोने पर सुहागा होगा। बुराई को जड़ से मिटाना चाहिए। फिर न नौ मन तेल होगा, न राधाएं नाचेंगी। यानि न कोई खाने वाला होगा, न ही कोई तम्बाकू बनाने वाला। है न आश्चर्य की बात! प्रकृति में धतूरे के पौधे स्वत:ही उग जाते हैं।

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