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दुनिया एक मुसाफिर खाना

शंकरलाल जांगिड़ ‘शंकर दादाजी’
रावतसर(राजस्थान) 
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रचनाशिल्प:मात्रा भार १६+१४=३० (ताटक छंद आधारित)

किस पर तू इतराए प्राणी, तेरा है नहिं मेरा है,
दुनिया एक मुसाफ़िर खाना, केवल रैन बसेरा है।

फँसा रहेगा मोह बंध में, जब तक है जीवन तेरा,
रिश्ते-नाते हैं सब मेरे, माल खज़ाना है मेरा।
साथ चले नहिं कुछ भी तेरे, जोगी वाला डेरा है।
दुनिया एक मुसाफ़िर खाना, केवल रैन बसेरा है॥

काट बंध सब माया के अब, वर्ना तू पछताएगा,
बहन-बेटियाँ, बेटे-पोते, कोई काम न आयेगा।
सत्कर्मों से ही जीवन में, होता नया सवेरा है।
दुनिया एक मुसाफ़िर खाना, केवल रैन बसेरा है॥

मतलब के सारे रिश्ते हैं, नोंच तुझे ये खायेंगे,
दौलत पाने की खातिर ये, सारे लठ्ठ बजाएँगे।
लड़ कर मर जाँएंगे सिर पर, लगा काल का घेरा है।
दुनिया एक मुसाफ़िर खाना, केवल रैन बसेरा है॥c

मिट्टी का ये तन है तेरा, मिट्टी में मिल जाएगा,
तेरा अपना खून एक दिन, तुझको आग लगाएगा।
उड़ जाएगा हंस छोड़ तन, चौरासी का फेरा है।
दुनिया एक मुसाफ़िर खाना, केवल रैन बसेरा है॥

ध्यान लगा मालिक का बंदे, वो ही पार लगाएगा,
राह चलेगा सत की तो सुख, से जीवन कट जाएगा।
आस उसी पर रखना ‘शंकर’, वो ही कुशल चितेरा है।
दुनिया एक मुसाफ़िर खाना, केवल रैन बसेरा है॥

परिचय-शंकरलाल जांगिड़ का लेखन क्षेत्र में उपनाम-शंकर दादाजी है। आपकी जन्मतिथि-२६ फरवरी १९४३ एवं जन्म स्थान-फतेहपुर शेखावटी (सीकर,राजस्थान) है। वर्तमान में रावतसर (जिला हनुमानगढ़)में बसेरा है,जो स्थाई पता है। आपकी शिक्षा सिद्धांत सरोज,सिद्धांत रत्न,संस्कृत प्रवेशिका(जिसमें १० वीं का पाठ्यक्रम था)है। शंकर दादाजी की २ किताबों में १०-१५ रचनाएँ छपी हैं। इनका कार्यक्षेत्र कलकत्ता में नौकरी थी,अब सेवानिवृत्त हैं। श्री जांगिड़ की लेखन विधा कविता, गीत, ग़ज़ल,छंद,दोहे आदि है। आपकी लेखनी का उद्देश्य-लेखन का शौक है