ममता सिंह
धनबाद (झारखंड)
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सोलह श्रृंगार नहीं तो क्या वो एक इंसान नहीं,
बाकी सभी पहचान अब किसी काम की नहीं।
औरों की नजरों में क्या उसे मर जाना चाहिए,
बच्चों को दूसरों के हवाले कर जाना चाहिए!
वही बच्चे जब दूसरों पर अब भारी बोझ बनेंगे,
“हमारे नहीं हैं” कहकर पल्ला झाड़ ही लेंगे।
इंसानों को बनाया है एक उसी भगवान ने,
सोलह श्रृंगार को बनाया यहीं इस मानव ने।
साँसों की डोर दी है एक उस भगवान ने,
साँसों को तोड़ भी दिया उसी एक भगवान ने।
इसमें फिर एक नारी का अब क्या है दोष ?
जब दूसरी नारी भी दिखाए अपना रोष।
समाज देने लगे जब ऐसी नारी को ताना,
एक नारी रूप जो अब लगने लगा सबको बेगाना।
सुबह-सवेरे जब सब मंदिर जाते पीठ पीछे मुँह फेरे,
हिकारत भरी एक दृष्टि जब उस नारी पर सब डारे।
मेरी यात्रा को अब तूने नारी कर दिया खराब,
जाने क्या सजा मिलेगी अब तो हमें बेहिसाब।
एक नारी ही जब दूसरी नारी की बनी दुश्मन,
ऐसी नारी से जब सब लोग मानने लगे घिन।
लगन शुभ काम में अब उसे किया जाता है वर्जित,
कल तक जो प्रिय सबकी और यश की थी अर्जित।
बात-बात पर कहते अब उसे ‘विधवा’ या ‘मसोमात&,
क्या उसे यह शब्द जनाब चुभते नहीं होंगे दिन-रात।
गाँव-देहातों और कम पढ़े-लिखे लोगों में है ये मान्यता,
दकियानूसी रूढ़ि-परंपरा आज भी चली आई सदा।
सभी से करती हूँ एक सवाल-क्या मानव अजर अमर है ?
जो वह इस ‘मृत्यु’ नामक राक्षस से बिल्कुल ही बेखबर है।
जब कोई उसकी हमसफ़र को विधवा कहकर बुलाए,
उस हमसफ़र का सारा परिचय मिट्टी में मिल जाए।
करो महाशय बस, तुम सब अब ये नवीन कल्पना,
जब रोए जीवनसाथी अब तो तुम्हारे ही बिना।
इसलिए हे बुद्धिमान मानव, सभी से तुम भी प्रेम करो,
किसी को सुख न दे सको तो कम से कम दुःख भी न दो।
ऐसा भी अगर तुम सब नहीं कर पाये मानव तो,
बस अपनी अपनी बारी का तो इंतजार करो।
विधुर पुरुष से तो कोई भी नहीं करता है नफ़रत,
हाँ, एक महीना होते-होते रिश्तों की होती है बरकत।
औरतें भी खुशी-खुशी सहर्ष उसे स्वीकार कर लेती,
कुंवारी कन्या भी अपने जीवन की बागडोर है सौंप देती।
फिर ऐसा सौतेला व्यवहार सिर्फ नारी ही क्यों भुगते ?
वह भी सम्मान की अधिकारिणी है, उसे अब सब बख्श दें।
मैं एक कवयित्री हूँ, और एक सामाजिक हिस्सा भी,
क्यों न दिखाऊं आइना, समाज में फैली कुरीतियाँ गलत-सही॥