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द्वंद में मन

ममता तिवारी ‘ममता’
जांजगीर-चाम्पा(छत्तीसगढ़)
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रचनाशिल्प २१२२ २१२२ २१२२ २…

वह पथिक क्यों है व्यथित तर ओस से भीगा,
यामिनी से कर रहा अठखेलियाँ धींगा।
हो रहा उर्वर मृदा मन कुछ तो बोया है,
अंकुरित होने लगा जो-युग से सोया है।

कौन हो मधुमास का आभास देते तुम,
मृत हृदय उपवन सुधामय साँस देते तुम।
कौन मानस देहरी थम द्वार बैठा है,
तप्त भू बढ़ता तरंगित ज्वार जैसा है।

द्वंद में मन धुन्ध में वह प्रणय प्रतिभागी,
याचना करता न है क्या छद्म अनुरागी।
है बुझा-सा क्या यही टूटा सितारा है,
श्वेत मुख ये शुष्क अधर किससे हारा है।

पुष्प प्रवाहित सदा मकरंद होता है,
तब कही बनती मधु जब पुहुप रोता है।
जो परागों से उड़ा क्या प्रेम धारा है,
मौन में रख आद्र ये किसने पुकारा है।

व्यूह रजनी भर रचा स्वयं कुंजिका खोया,
भोर स्पंदन शून्य वृत में है अभी सोया।
नैन कारावास में थी रश्मियां सिमटी,
मुक्त कर आलोक ज्यों दी रुग्ण को बूटी।

दिव्य कोपल नेत्र के हर छोर फूटा है,
क्या अलौकिक प्रेम का यह बांध टूटा है।
है वृथा आधार हिन यह बेल रोको तुम,
धार दे या मोह की सलिला न सोखो तुम॥

परिचय–ममता तिवारी का जन्म १अक्टूबर १९६८ को हुआ है। वर्तमान में आप छत्तीसगढ़ स्थित बी.डी. महन्त उपनगर (जिला जांजगीर-चाम्पा)में निवासरत हैं। हिन्दी भाषा का ज्ञान रखने वाली श्रीमती तिवारी एम.ए. तक शिक्षित होकर समाज में जिलाध्यक्ष हैं। इनकी लेखन विधा-काव्य(कविता ,छंद,ग़ज़ल) है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आपकी रचनाएं प्रकाशित हैं। पुरस्कार की बात की जाए तो प्रांतीय समाज सम्मेलन में सम्मान,ऑनलाइन स्पर्धाओं में प्रशस्ति-पत्र आदि हासिल किए हैं। ममता तिवारी की लेखनी का उद्देश्य अपने समय का सदुपयोग और लेखन शौक को पूरा करना है।