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धर्म अंदर का विषय

संदीप धीमान 
चमोली (उत्तराखंड)
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धर्म अंदर का विषय है
हम बाहर तलाश रहे हैं,
मौन में मालिक है-
हम सौर में झांक रहे हैं।

है त्याग और तपस्या
वासना में नाप रहे हैं,
अधर्मी स्वयं होकर भी-
दूसरे को डांट रहे हैं।

रास्ते मन के हैं
मनकों में नाप रहे हैं,
है एक ही ऊपर वाला-
फिर भी अपने को ढांक रहे हैं।

कहीं पत्थर है हाथों में
कहीं गट्ठर है बातों में,
एक ही मालिक को-
काट,हिस्सों में गाँठ रहे हैं।

पैगम्बर वही तो है,जिसे
अवतार दुनिया कही है,
झगड़ना खुद से ही था-
सड़कों पर झाँक रहे हैं।

धर्म अंदर का विषय है,
हम बाहर तलाश रहे हैं…॥

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