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नई ऊर्जा और नए संकल्प का वर्ष-सिद्धेश्वर

पटना (बिहार)।

हर बार की तरह देखते-देखते पुराने साल की स्मृतियाँ शेष रह गई और हमारे जीवन में नए साल ने दस्तक दे दी नई उमंग, नई कल्पना, नई भावना और नए संकल्प के साथ। मन की निराशाओं का मत बन तू संगी-साथी/विश्वास को अपने कंधे पर लादा है लाखों ने।
भारतीय युवा साहित्यकार परिषद् के तत्वावधान में आभासी साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए सिद्धेश्वर ने यह उद्गार व्यक्त किए। प्रतिष्ठित लघुकथाकार सिद्धेश्वर ने पिछले दिनों पश्चिम बंगाल में आयोजित राष्ट्रीय लघुकथा सम्मेलन में
बतौर विशिष्ट अतिथि अपने अनुभव को भी साझा किया l बिहार का प्रतिनिधित्व करते हुए उन्होंने कहा कि, पूरे विश्व में पहली बार देश की ५ भाषाओं की लघुकथाएं एक मंच पर ‘राष्ट्रीय लघुकथा उत्सव’ (२८-२९ दिसम्बर २०२३), इतिहास में दर्ज होने वाली यह तारीख गवाह है लघुकथा के इस ऐतिहासिक पल की। साहित्य की सर्वाधिक लोकप्रिय विधा लघुकथा के विकास में आज के दिन को उपेक्षित करना किसी के लिए भी संभव नहीं होगा, क्योंकि इस उत्सव में हिंदी भाषा के साथ देशभर से आए हुए लघुकथाकारों ने बांग्ला, मैथिली, पंजाबी आदि भाषाओं में मूल रचनाओं के साथ उन लघुकथाओं का हिंदी अनुवाद भी मूल लेखक की उपस्थिति में प्रस्तुत किया। चुनी गई लघुकथाओं की मंचीय प्रस्तुति भी की गई। इस पहल के लिए बंगाल के लोगों को नहीं, बल्कि पूरे देश के लघुकथाकारों को गर्व महसूस करना चाहिए, जो सचमुच लघुकथा का विकास चाहते हैं।
नए साल की इस प्रथम आभासी संगोष्ठी की मुख्य अतिथि लेखिका राज प्रिया रानी ने कहा कि, बीते वर्ष में इस संस्था ने सिद्धेश्वर जी के माध्यम से राष्ट्रीय पहचान बनाई। अध्यक्ष सिद्धेश्वर जी को कोलकाता राष्ट्रीय लघुकथा सम्मेलन में विशिष्ट अतिथि के रुप में आमंत्रित किया गया। इस प्रकार लघुकथा आंदोलन के विकास में सिद्धेश्वर जी की अभूतपूर्व भूमिका राष्ट्रीय स्तर पर रेखांकित की गई।
संगोष्ठी में विजय प्रकाश ने ‘अंजुरी भर गुलाबी धूप/और एक सूप जाड़ा/नव वर्ष आ रहा है/एक बार फिर!’, पूनम श्रेयषी ने ‘चाक दामन को फिर से रफ्फु, ज़ख्म भर जाए, सब आरज़ू कीजिये।!’, रंजन लता ने ‘एक मोहब्बत और न दूजा!’, इंदु उपाध्याय ने ‘जीवन से भरी तेरी आँखें, मजबूर कर जीने के लिए’, डॉ. अनुज प्रभात ने ‘साल के आखिरी पन्ने पर लिखूँ तो क्या लिखूं! ?’ और सिद्धेश्वर ने ‘कई नई उड़ान भरे हैं इन पाँखों ने।/ पुराने साल की तरह झड़ गए सारे पत्ते तो क्या?/नई उम्मीदों के कोपल दिखलाए हैं इन शाखों ने॥’ जैसी उत्कृष्ट रचनाओं का पाठ किया। हरिनारायण सिंह हरि, बीना गुप्ता, सपना चंद्रा, सेवा सदन प्रसाद आदि की भी सक्रिय भागीदारी रही।