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नव संवत्सर

सुरेश चन्द्र सर्वहारा
कोटा(राजस्थान)
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हे पुण्य श्लोक नव संवत्सर
समय-शिखर से झरते निर्झर,
कर ऊर्जा से वसुधा पूरित
क्षण-क्षण अविरल गति को संचर।
सौंदर्य प्रकृति का उर में भर
जाए जग-जीवन और निखर,
युग-अंध तमस को दूर करे
उगते दिनकर की किरण प्रखर।
हैं खिले फूल कितने सुन्दर
चूमें लतिका उन्नत तरुवर,
बह शीतल मन्द हवा भीनी
करती हिल्लोरित जन-मन-सर।
यह चैत्र मास यह कुसुमाकर
है जीव सृष्टि का पुलकित हर,
यह समय नवल निर्माणों का
है बीत चुका कब का पतझर।
हैं मनुज सभी अंतः निर्भर
सुख-दुःख ग्रंथित सभी परस्पर,
फिर भी भर स्वप्न-उड़ानों को
हर बाधा का लाँघें भूधर।
यह शक्ति रूप पूजित घर-घर
नश्वरता में भरता नव स्वर,
लेकर आया नव चेतनता
करने मानवता और मुखर।
यह समय न रुकता कहीं ठहर
चलता निश-दिन ही आठ पहर,
हम लक्ष्य-प्राप्ति तक थमें नहीं
कहता यह आकर संवत्सर॥

परिचय-सुरेश चन्द्र का लेखन में नाम `सर्वहारा` हैl जन्म २२ फरवरी १९६१ में उदयपुर(राजस्थान)में हुआ हैl आपकी शिक्षा-एम.ए.(संस्कृत एवं हिन्दी)हैl प्रकाशित कृतियों में-नागफनी,मन फिर हुआ उदास,मिट्टी से कटे लोग सहित पत्ता भर छाँव और पतझर के प्रतिबिम्ब(सभी काव्य संकलन)आदि ११ हैं। ऐसे ही-बाल गीत सुधा,बाल गीत पीयूष तथा बाल गीत सुमन आदि ७ बाल कविता संग्रह भी हैंl आप रेलवे से स्वैच्छिक सेवानिवृत्त अनुभाग अधिकारी होकर स्वतंत्र लेखन में हैं। आपका बसेरा कोटा(राजस्थान)में हैl