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नाम ही नाम

सच्चिदानंद किरण
भागलपुर (बिहार)
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नाम को नाम का,
नाम में नाम से
नाम की पहचान।

जन्म के बाद,
सुकर्म-धर्म की रेखा
ही यथोचित नामकरण,
कराता व्यतीत जीवन
परिधि संस्कार के केन्द्र से,
नाम के लिए
नाम में‌ नाम का।

तन तो नाशवान है,
मन तो उन्मादी तरंग
कभी रूकता ही नहीं,
हाँ, शांति से एकाग्रचित
भाव में संतुलित व,
सन्मार्ग की राहों पर अग्रसर
आत्मा सूक्ष्म स्थूल व,
अमर है, जिसमें बसे है।

शीतल प्रेम-रस के,
अमृत पिलाना सदैव है
तैयार अपना पवित्र,
भावनी हृदय क्षम्य स्थूल
शोभनीय नाम के लिए,
नाम में उजगार हो।

नाम विश्वजीत‌ हो,
या प्रेमजीत‌ फर्क क्या ?
नाम नहीं कर्म की,
यथेष्ठता का संबोधन हो
जनहित, समाजहित व राष्ट्रहित के,
गौरवशाली इतिहास को
समृद्ध वैभव की,
उत्कृष्ठ आकांक्षाओं‌ में।

नाम को नाम की,
पहचान के लिए यशकृत्व की
महान श्रद्धा सुमन से,
अर्पित-समर्पित
आस्था से स्वाभिमान से,
सदृढ़ आत्मनिर्भता में
तो ही नाम नामित हो।
स्वर्ण अक्षरों में शिलापट पे,
अंकित ‘नाम ही नाम॥’

परिचय- सच्चिदानंद साह का साहित्यिक नाम ‘सच्चिदानंद किरण’ है। जन्म ६ फरवरी १९५९ को ग्राम-पैन (भागलपुर) में हुआ है। बिहार वासी श्री साह ने इंटरमीडिएट की शिक्षा प्राप्त की है। आपके साहित्यिक खाते में प्रकाशित पुस्तकों में ‘पंछी आकाश के’, ‘रवि की छवि’ व ‘चंद्रमुखी’ (कविता संग्रह) है। सम्मान में रेलवे मालदा मंडल से राजभाषा से २ सम्मान, विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ (२०१८) से ‘कवि शिरोमणि’, २०१९ में विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ प्रादेशिक शाखा मुंबई से ‘साहित्य रत्न’, २०२० में अंतर्राष्ट्रीय तथागत सृजन सम्मान सहित हिंदी भाषा साहित्य परिषद खगड़िया कैलाश झा किंकर स्मृति सम्मान, तुलसी साहित्य अकादमी (भोपाल) से तुलसी सम्मान, २०२१ में गोरक्ष शक्तिधाम सेवार्थ फाउंडेशन (उज्जैन) से ‘काव्य भूषण’ आदि सम्मान मिले हैं। उपलब्धि देखें तो चित्रकारी करते हैं। आप विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ केंद्रीय कार्यकारिणी समिति के सदस्य होने के साथ ही तुलसी साहित्य अकादमी के जिलाध्यक्ष एवं कई साहित्यिक मंच से सक्रियता से जुड़े हुए हैं।

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