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निर्माण नवल मानक पतझड़

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)

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जर्जरता बस पतझड़ जीवन,
अपमानित कभी मत कीजिए।
हम भी कभी थे पूजनीय,
तरुणाई परवान समझिए।

बाल यौवन जरा अवस्था जीवन,
आदिकाल चिर रीति समझिये।
स्थिति नहीं अविचल रहती जग,
समझ पतझड़ से प्रीति कीजिए।

नवयौवन उन्माद अनल जल,
शौर्य परायण जोश समझिए।
अपमान करे जो जरा वयस,
खोता दम्भित होश समझिए।

नवपादप किसलय बाल रूप,
अभिनव कोमल लाड़ समझिए।
सुदृढ़ सुपात्र नवयौवन कुसुमित,
पुरुषार्थ सुपथ उपहार समझिए।

कर्तव्य पूर्ण कर आगत भविष्य,
प्रेरक दिग्दर्शक जरा समझिए।
अवसान जगत पतझड़ जीवन,
नवल सृजन परमार्थ समझिए।

स्वागत वसन्त मधुमास मधुर,
नवल ज्योति अभिलाष समझिए।
पतझड़ जीवन नव मृदु पल्लव,
सुरभि सुमन उल्लास समझिए।

निर्माण नवल मानक पतझड़,
आधान सुखद उत्थान समझिए।
खुशियाँ भविष्य मुस्कान अधर,
स्वर्णिम अतीत अरमान समझिए।

अनुभूति विशद जीवन पतझड़,
यौवन चिर गुलज़ार समझिए।
चहु सूझबूझ नित प्रगतिपरक,
धरोहर व उपहार समझिए॥

परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥ 
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥

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