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नींबू को लगी महंगाई की नजर

अजय बोकिल
भोपाल(मध्यप्रदेश) 

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अमूमन बुरी नजर से बचाने वाले नींबू को ही इस बार जब महंगाई की बुरी नजर लग गई तो इसका उतारा क्या है ? दांतों पर नींबू रगड़ने वाले भी परेशान हैं कि गुलाब जामुन के भाव बिकने वाले नींबू का क्या करें ? आम तौर पर चिलचिलाती गर्मी में भी रूपए-२ रूपए का मिलने वाला नींबू इस बार १० रू. में १ भी मुश्किल से मिल रहा है और किलो के हिसाब से तो भाव ४०० रू. को पार कर गया है। बड़ी मुसीबत तो गर्मी में नींबू पानी बेचकर खुद का पेट पालने वालों की है। वो किसी तरह १ नींबू में ४ ग्लास बनाकर रोजी का जुगाड़ कर रहे हैं। गोया नींबू ने उन्हें ही निंचोड़ लिया है।
हमारे यहां नींबू एक ऐसा फल है, जो रसोई से औषधि तक और खेल से लेकर तांत्रिक टोटकों तक समान रूप से इस्तेमाल होता है। नींबू का अचार तो हर भारतीय के के खाने का हिस्सा है ही, साथ में घरेलू उपचार का भी जरूरी भाग है। खुद में साइट्रिक एसिड रखने वाला नींबू अम्लता को हरता है। नींबू पानी लू से राहत देता है। वो सलाद के साथ जरूरी है तो खेलों में नींबू वो बिरला फल है, जो मुँह में चम्मच पर नींबू रखकर होने वाली दौड़ में काम आता है। खास बात यह है कि नींबू शुद्ध रूप से भारतीय फल है और भारत में ही सबसे ज्यादा होता तथा खाया भी जाता है। कहते हैं कि इसे सबसे पहले असम में उगाया गया, लेकिन अब यह सबसे ज्यादा आंध्र प्रदेश और गुजरात में पैदा होता है। नींबू पैदावार के मामले में मध्यप्रदेश का देश में पांचवां क्रम है। भारत में नींबू की सर्वाधिक खपत है और पैदावार भी बहुत है।सालाना ३७ लाख टन से ज्यादा उत्पादन होता है। हम न तो नींबू का आयात करते हैं और न ही निर्यात। इस अर्थ में नींबू हकीकत में ‘आत्मनिर्भर’ भारत का प्रतीक फल है।
हमारे देश में नींबू की साल में ३ फसलें आती हैं, इसलिए नींबू लगाना फायदे का सौदा है। ये ‘बहारे’ हैं अंबे, मृग और हस्त। हालांकि, मोटे तौर पर नींबू के कुल उत्पादन का ६० फीसदी अप्रैल के महीने में आता है, जो इस बार नहीं आया। यही अंबे बहार कहलाती है। कारण कि बेमौसम बारिश और तेज गर्मी के चलते नींबू के फूल फरवरी में ही झड़ गए। फल बन ही नहीं पाया। अब आलम यह है कि नींबू का टोटा है और भाव आसमान छू रहे हैं।
बहरहाल, इस साल नींबू की दुर्लभता ने अहमियत का अहसास तो करा ही दिया है। उधर टोटकेबाज और तांत्रिक भी परेशान हैं कि मुआ नींबू तक आसानी से नहीं ‍मिल रहा। कहते हैं ‍कि नींबू से वशीकरण बहुत आसान होता है। आप शत्रु को तुरंत भगा सकते हैं, लेकिन अगर यही आपदा नींबू पर आन पड़े तो कोई तोड़ नहीं है।
ऐसे में नींबू मिर्च के पारंपरिक टोटके में भी नींबू का आकार और छोटा हो गया है। रोजाना तो वह मिल भी नहीं रहा। ऐसे में टोटकेबाजों ने मिर्च की मात्रा बढ़ा दी है। बड़े शहरों में दुकानों पर नींबू-मिर्च का टोटका टांगना भी एक व्यवसाय है। धंधे वालों का मानना है कि ये टोटका लटकाने से लक्ष्मी आती है और लक्ष्मी की बहन दरिद्रा (अलक्ष्मी) दूर रहती है। कहते हैं कि दरिद्रा को खट्टा और तीखा पसंद है। इसीलिए वो नींबू और मिर्ची पर हाथ मारती है तथा तृप्त होकर लौट जाती है। कुछ लोग तो कार में नींबू-मिर्च का टोटका टांग कर चलते हैं। मानकर कि इससे दुर्घटना नहीं होगी।
नींबू हमारे जीवन में किस गहराई से शामिल है, यह नींबू पर बनी कहावतों से समझा जा सकता है, जो हमारे सदियों के सामूहिक अनुभव से उपजी हैं। नींबू मोटापा रोकने में सक्षम है। मितली आने पर भी नींबू ही मदद करता है। इसी तरह अम्लता होने पर नींबू- पानी लेने के लिए किसी चिकित्सक के पास जाने की जरूरत नहीं है। एक दोहा है-‘आधा नींबू काटिए सेंधा नमक मिलाय, भोजन प्रथमहि चूसिए सौ अजीर्ण मिट जाए।‘ नींबू ताकतवर फल भी है। इसीलिए कहा जाता है कि ‘एक नींबू मनों दूध को भी फाड़ देता है।‘ छेना तो नींबू की बदौलत ही बनता है। नींबू का रिश्ता मूंछों की शान से भी है। मसलन मूंछों पर नींबू टकने का अर्थ है शान से मूंछें मरोड़ना। किसी को जलील करने का मतलब है ‘नाक काट के नींबू निचोड़ना।‘ और तो और धंधे में घाटे के लिए भी बुजुर्गों ने नींबू का सहारा लिया यानी ‘आम की कमाई, नींबू में गंवाई।‘ फिलहाल जब तक नींबू की अगली फसल न आ जाए, दिल में उम्मीद का टोटका टांगे रखिए…!

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