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पद-प्रभाव का दुरूपयोग विचारणीय

डॉ.अरविन्द जैन
भोपाल(मध्यप्रदेश)
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प्रजातंत्र में चुने हुए प्रतिनिधियों को विधायिका मानते हैं,उनके अधीनस्थ कार्यपालिका निश्चित रूप से उनकी सहायता करने,उनकी मंशाओं को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध होती या रहती है। बहुत सीमा तक न्यायपालिका भी अप्रभावित नहीं रहती है। बुद्धिमान राजा यानी वर्तमान में प्रधान मंत्री को स्वयं और अधीनस्थों को यानी मत्रियों को निम्न गुणों का धारक बनाना चाहिए-प्रधानमंत्री द्विज, स्वदेशवासी,सदाचारी,कुलीन,व्यसनों से रहित,द्रोह ना करने वाला,नीतिज्ञ,निष्कपट युद्ध-विद्या विशारद होना चाहिए।
दुराचार-खोता आचरण (कुत्सित और निंद्य कर्मों में प्रवत्ति)विष भक्षण की तरह समस्त गुणों को नाश कर देता है। अर्थात जिस प्रकार विष का भक्षण जीवन नष्ट कर देता है,उसी प्रकार दुराचार भी विद्या,कला और नीतिमत्ता आदि मानवोचित गुणों को अथवा राज्य की वृद्धि और रक्षा करने वाले संधि और विग्रह आदि गुणों को नष्ट कर देता है। राजा का मंत्री सदाचारी होना चाहिए,अन्यथा दुराचारी होने पर राज्यवृक्ष का मूल (राजनीतिक ज्ञान) और सैनिक संगठन आदि सद्गुणों के अभाव से राज्य की क्षति सुनिश्चित रहती है।
कुलीन पुरुषों में विश्वासघात आदि दोषों का होना अमृत का विष होने के समान है। जिस प्रकार अमृत विष नहीं हो सकता,उसी प्रकार उच्च कुल वालों में भी विश्वासघात आदि दोष नहीं हो सकते। क्षुद्र प्रकति वाले मंत्री-अधिकारी आदि द्वारा अपने अधिकारों में नियुक्त किए घोड़े योग्यता प्राप्त कर लेने पर (चाल आदि सीख लेने पर) दमन करने से उन्मुक्त होकर सवार होकर सवार को जमीन पर पटकना आदि विकार युक्त हो जाते हैं,उसी प्रकार अधिकारीगण भी क्षुद्र प्रकृतिवश गर्व युक्त होकर राज्य क्षति करने पर तत्पर रहते हैं,अतः राजा को सदा उनकी परीक्षा-जाँच करते रहना चाहिए।
पटना(बिहार) के पूर्व आईपीएस ने यह आरोप लगाया कि,सरकार और उसके कई मंत्रियों को अधीक्षिका के माध्यम से मंत्रियों तक भेजा जाता है। इससे पुष्टि होती है कि,जब गंगोत्री ही अपवित्र है,तब गंगा कहाँ तक पवित्र होगी। जब एक जिम्मेदार पुलिस अफसर इस बात को उद्घाटित करता है,तब उस राज्य की स्थिति कितनी घिनौनी होगी। वैसे वैश्यावृत्ति,परस्त्री सेवन का व्यवसाय प्राचीनतम है,और इस पर बंदिश नहीं लगाई जा सकती है,पर घिनौने कृत्यों को सार्वजनिक करना कितना उचित है! इससे बलशाली,शक्तिशाली, प्रभावशाली लोग अपने प्रभाव का कितना दुरूपयोग करते हैं,और उससे अपने अधीनस्थों से कितना गलत काम कराते हैं,यह विचारणीय है।
वर्तमान में चरित्रवान व्यक्ति आज के मशीनीकरण में अयोग्य है। जो जितना अपराधी,पापी दुराचारी होगा,वही उन्नति वाला बन सकता है। आज अधिक शिक्षित उतने अधिक अपराधी हो रहे हैं,ऐसा क्यों ?कारण हम शीघ्र धनवान,बलवान,शक्तिशाली, प्रभावशाली बनने को कुछ भी करने को तैयार हैं। वर्तमान में चरित्र-नैतिकतता का स्थान कहीं नहीं दिखाई देता है। ये सब बातें शब्दकोष में निहित हैं। अधिकारी अपना स्वार्थ सिद्ध करने या मनमाफिक स्थान पर पदस्थापना के लिए सब-कुछ करने को तैयार रहते हैं,और मंत्री बहुत कम कार्यकाल के लिए होने व प्रभावशील होने से कुछ भी करते हैं ।यह क्या वास्तव में उनकी मजबूरी है ?,पर अधिकारी क्यों ज़मीर बेचकर नौकरी करते हैं,क्या पद,पदस्थापना,स्थानांतरण के कारण डरते हैं ? इन सब कुकृत्यों का परिणाम भोगना होते हैं,इसके लिए करने,कराने और समर्थन करने वाले भी पूर्ण अपराधी होते हैं।

परिचय- डॉ.अरविन्द जैन का जन्म १४ मार्च १९५१ को हुआ है। वर्तमान में आप होशंगाबाद रोड भोपाल में रहते हैं। मध्यप्रदेश के राजाओं वाले शहर भोपाल निवासी डॉ.जैन की शिक्षा बीएएमएस(स्वर्ण पदक ) एम.ए.एम.एस. है। कार्य क्षेत्र में आप सेवानिवृत्त उप संचालक(आयुर्वेद)हैं। सामाजिक गतिविधियों में शाकाहार परिषद् के वर्ष १९८५ से संस्थापक हैं। साथ ही एनआईएमए और हिंदी भवन,हिंदी साहित्य अकादमी सहित कई संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। आपकी लेखन विधा-उपन्यास, स्तम्भ तथा लेख की है। प्रकाशन में आपके खाते में-आनंद,कही अनकही,चार इमली,चौपाल तथा चतुर्भुज आदि हैं। बतौर पुरस्कार लगभग १२ सम्मान-तुलसी साहित्य अकादमी,श्री अम्बिकाप्रसाद दिव्य,वरिष्ठ साहित्कार,उत्कृष्ट चिकित्सक,पूर्वोत्तर साहित्य अकादमी आदि हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-अपनी अभिव्यक्ति द्वारा सामाजिक चेतना लाना और आत्म संतुष्टि है।

 

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