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पन्ने चूमती कलम

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)

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मैं कागज़ के कोरे पन्नों पर,
अविरत अन्तर्मन भाव लिखती हूँ,
जन ज़ज़्बातों की मालाओं को,
कोरे कागज़ पर रव गढ़ती हूँ।

हूँ मौन किन्तु अविरत लेखन पथ,
कलम संवेद भाव चूमती हूँ
‘संजय’ बन नित दिग्दर्शक जग,
भूत-भविष्य मानक गढ़ती हूँ।

हूँ दर्पण बन नित वर्तमान का,
व्यथित हृदय का दर्द पढ़ती हूँ
जनजीवन के गर्दिश अवसादन,
कोरे कागज़ अविरत लिखती हूँ।

जीवन की घटती दुर्घटनाएँ,
स्वार्थ कपट छल नफ़रत पढ़ती हूँ
नित देख रही बिकते अपनों को,
कुछ भटकी कलमें चूम रही हैं।

अब राष्ट्र द्रोह बस बदज़ुबान बन,
चौथ नयन पथ बन खेल रही हूँ
नित जाति धर्म-भाषा में बँटकर,
कलमें कागज़ को चूम रही है।

क्रान्ति दूत मैं अविरत मशाल बन,
आज़ादी रण कृति नित रचती हूँ
स्वर्णिम अतीत का गीत मधुरतम,
चिरकालिक अब तक नित गाती हूँ।

हूँ मन भावुक करुणार्द्र सदय मैं,
नित दीन-दलित धड़कन लिखती हूँ
राजनीति कूटनीति घटित राष्ट्र,
नित सामाजिक बातें गढ़ती हूँ।

लावारिश लाशों से पटे हुए,
सड़क छाप जन जीवन पढ़ती हूँ
दुष्कर्मी कामी खल जन समाज,
नारी उत्पीड़न से दिल रोती हूँ।

अवसाद ज़ख़्म घायल जन चितवन,
कोरे कागज़ पर गम लिखता हूँ
राष्ट्र भक्ति और प्रेम भाव हृदय,
मैं कलम निरत जन मन गढ़ती हूँ।

जनता आर्तनाद द्वन्द्व अन्तर्मन,
देश-काल पात्र जगत पढ़ती हूँ
न्याय नीति व त्याग सत्यविनायक,
समरसता नित कागज़ गढ़ती हूँ।

कागज़ से चिर सम्बन्ध स्वयं का,
प्रीति मधुर मन साजन बनती हूँ
ऋतुराज माधवी प्रीत मिलन रस,
राष्ट्र प्रेम अधर मुख चूमती हूँ।

अरुणाभ सृष्टि संगीत मधुरतम,
कल्याण मनुज बस दिल रखती हूँ
हो प्रकृति स्वच्छ निर्मल नभ भूतल,
नवआश हृदय कागज़ गढ़ती हूँ।

हूँ अति घायल गमगीन हृदय तल,
चौथ नैन लेखन लखि चिन्तित हूँ
कहीं भविष्यत कोरे कागज़ बन
मैं कलम शोक विह्वल रहती हूँ।

मैं कलम लेख नित काल भाल पर,
इतिहास स्वर्ण गाथा लिखती हूँ।
सजनी बन कोरे कागज़ मधुरिम,
नव प्रगति कीर्ति चुम्बन करती हूँ॥

परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥ 
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥