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पश्चाताप

मधु मिश्रा
नुआपाड़ा(ओडिशा)
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रक्षाबंधन विशेष……..

“राधा…सुन..! ये मोर पंख वाली राखी तुझे अच्छी लग रही थी न..! ले…लेजा इसे अपने भाई को बांधना… I” वेदिका ने पिछले साल की राखी अपनी काम वाली बाई को देते हुए कहा।
“राखी तो मैं..ख़रीद ली हूँ दीदी! ” राधा ने कपड़ा सुखाते हुए कहा।
“जानती भी है ये राखी कितने की है..! पिछले साल चार सौ रुपए की थी..! इस साल तो इसकी कीमत और भी ज़्यादा हो गई होगी…और ये जस की तस है…थोड़ी देर ही तो इसे भैया ने पहना था…!” वेदिका ने थोड़ा उखड़े से स्वर में कहा।
“असल में दीदी,राखी न…कोरी (नई) हो तभी बांधने में अच्छा लगता है…भले ही सस्ती हो…!” सकुचा कर राधा ने धीमी आवाज़ में कहा।
राधा के सकुचाते हुए उत्तर ने वेदिका के भीतर कोलाहल मचा दिया… “हाँ सच ही तो कह रही है राधा,राखी चाहे जितनी महँगी हो…या ख़ूबसूरत… हर साल नई राखी ही तो बांधी जाती है… मुझे राधा से ऐसा नहीं कहना चाहिए था…!” ये सोच-सोच कर वेदिका बहुत देर तक अपने-आपको दोषी ठहराती रही…। तभी उसने घड़ी की तरफ़ देखा,राधा को घर जाने में तो अभी एक घंटा है…तब तक मैं वापस आ जाऊँगी… ये सोचते हुए वेदिका ने बाजार जाकर एक मोर पंख वाली राखी ख़रीदी और एक डिब्बा मिठाई…जिसे घर आकर राधा को देते हुए उसने कहा.. -“अब तो बांधेगी न राधा…!”
“ओ…दीदी,मेरा कहने का मतलब ये थोड़े ही था, आप मेरे लिए इतनी महँगी राखी क्यों ले आईं…!” कहते हुए राधा की आँखें छलक गईं…।
“भग पागल,त्यौहार में कोई रोता है क्या,ख़ुशी की हक़दार तो तुम भी हो…मेरे लिए तू जितना करती है उसके बदले में क्या मैं तुझे ये ख़ुशी नहीं दे सकती … इस बार अपने भाई की कलाई में मेरा भी प्यार बांध देना…समझी..!” कहते हुए वेदिका की आँखें भी अब पश्चाताप से भीग रही थी।

परिचय-श्रीमती मधु मिश्रा का बसेरा ओडिशा के जिला नुआपाड़ा स्थित कोमना में स्थाई रुप से है। जन्म १२ मई १९६६ को रायपुर(छत्तीसगढ़) में हुआ है। हिंदी भाषा का ज्ञान रखने वाली श्रीमती मिश्रा ने एम.ए. (समाज शास्त्र-प्रावीण्य सूची में प्रथम)एवं एम.फ़िल.(समाज शास्त्र)की शिक्षा पाई है। कार्य क्षेत्र में गृहिणी हैं। इनकी लेखन विधा-कहानी, कविता,हाइकु व आलेख है। अमेरिका सहित भारत के कई दैनिक समाचार पत्रों में कहानी,लघुकथा व लेखों का २००१ से सतत् प्रकाशन जारी है। लघुकथा संग्रह में भी आपकी लघु कथा शामिल है, तो वेब जाल पर भी प्रकाशित हैं। अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता में विमल स्मृति सम्मान(तृतीय स्थान)प्राप्त श्रीमती मधु मिश्रा की रचनाएँ साझा काव्य संकलन-अभ्युदय,भाव स्पंदन एवं साझा उपन्यास-बरनाली और लघुकथा संग्रह-लघुकथा संगम में आई हैं। इनकी उपलब्धि-श्रेष्ठ रचनाकार सम्मान,भाव भूषण,वीणापाणि सम्मान तथा मार्तंड सम्मान मिलना है। आपकी लेखनी का उद्देश्य-अपने भावों को आकार देना है।पसन्दीदा लेखक-कहानी सम्राट मुंशी प्रेमचंद,महादेवी वर्मा हैं तो प्रेरणापुंज-सदैव परिवार का प्रोत्साहन रहा है। देश और हिंदी भाषा के प्रति विचार-“हिन्दी मेरी मातृभाषा है,और मुझे लगता है कि मैं हिन्दी में सहजता से अपने भाव व्यक्त कर सकती हूँ,जबकि भारत को हिन्दुस्तान भी कहा जाता है,तो आवश्यकता है कि अधिकांश लोग हिन्दी में अपने भाव व्यक्त करें। अपने देश पर हमें गर्व होना चाहिए।”

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