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‘पिता’ जीवन-निर्माता भी

ललित गर्ग
दिल्ली

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जून महीने के तीसरे रविवार को ‘अंतर्राष्ट्रीय पिता दिवस’ यानी फादर्स डे मनाया जाता है। पिता दिवस की शुरुआत बीसवीं सदी के प्रारंभ में पिताधर्म तथा पुरुषों द्वारा परवरिश का सम्मान करने के लिए मातृ-दिवस के पूरक उत्सव के रूप में हुई। यह हमारे पूर्वजों की स्मृति और उनके सम्मान में भी मनाया जाता है। दुनिया के अलग-अलग देशों में अलग-अलग दिन और विविध परंपराओं के कारण उत्साह एवं उमंग से यह दिवस मनाया जाता है। हिन्दू परंपरा के मुताबिक पितृ दिवस भाद्रपद महीने की सर्वपितृ अमावस्या के दिन होता है। पिता एक ऐसा शब्द, जिसके बिना किसी के जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। एक ऐसा पवित्र रिश्ता, जिसकी तुलना किसी और रिश्ते से नहीं हो सकती। बचपन में जब कोई बच्चा चलना सीखता है तो सबसे पहले अपने पिता की उंगली थामता है। नन्हा-सा बच्चा पिता की उँगली थामे और उसकी बाँहों में रहकर बहुत सुकून पाता है। बोलने के साथ ही बच्चे जिद करना शुरू कर देते हैं और पिता उनकी सभी जिदों को पूरा करते हैं। संतान की सभी माँगों को वो पूरा करते रहते हैं लेकिन एक समय ऐसा आता है जब भाग-दौड़ भरी इस जिंदगी में बच्चों के पास अपने पिता के लिए समय नहीं मिल पाता है। इसी को ध्यान में रखकर पितृ दिवस मनाने की परंपरा का आरम्भ हुआ।
मानवीय रिश्तों में दुनिया में सबसे बड़ा स्थान माँ को दिया जाता है, लेकिन एक बच्चे को बड़ा और सभ्य बनाने में उसके पिता का योगदान कम करके नहीं आंका जा सकता। बच्चे को जब कोई खरोंच लग जाती है तो जितना दर्द माँ महसूस करती है, वही पिता भी महसूस करते हैं। पिता बेटा की चोट देख कर कठोर इसलिए बना रहता है ताकि वह जीवन की समस्याओं से लड़ने का पाठ सीखे, सख्त एवं निडर बनकर जिंदगी की तकलीफों का सामना करने में सक्षम हो। माँ ममता का सागर है पर पिता उसका किनारा है। माँ से ही बनता घर है पर पिता घर का सहारा है।
कुछ दशक पूर्व के पिताओं ने अपनी भूमिका में एक क्रांति लाई। इसके साथ ही एकल परिवार, शहरीकरण, रोजगार, आधुनिकता, बदलता साहित्य, सिनेमा ने भी उस पिता के आचरण में एक बदलाव लाया। वर्तमान समय के पिता का रूप काफी बदल गया है। पिता बनना आज सिर्फ एक जैविक क्रिया न होकर एक सामाजिक क्रिया भी हो चुकी है। अब समाज में एकल पिता का भी विचार आ चुका है। अब एकल पिता अपने बच्चों का न केवल ख्याल रखते हैं बल्कि उन्हें माँ की कमी महसूस नहीं होने देते हैं।
आधुनिक पिताओं की भूमिका में काफी बदलाव आया है, अब वे अपने बच्चों को दूध पिलाने से लेकर उसके डायपर, नैपी तक बदल रहे हैं वो भी पूरी खुशी, प्रतिष्ठा और सम्मान के साथ। कुछ तो समाज की नई बयार ने भी मदद की है जिसमें पति पत्नी दोनों काम-काजी हैं। आज बच्चे अपने पिताओं से भी बहुत दोस्ताना संबंध बनाने लगे हैं क्योकि ये आधुनिक पिता बहुत लोकतान्त्रिक एवं संवेदनात्मक व्यवहार वाले हैं। यह बच्चों पर दबाव नहीं बनाते। बच्चों का भविष्य अच्छा वही सोच सकते हैं, इस बात पर बच्चों का शोषण नहीं करते। यदि बेटियों ने भी खुद की मर्जी से विवाह, शिक्षा या व्यवसाय चुनने की बात की तो गंभीरता से विचार करते हैं। सबसे ध्यान देने की बात कि आज के कई पिता एकल बालिका शिशु के अभिभावक बनने में भी गर्व महसूस करते हैं। उन्हें वंश बनाने और बढ़ाने के लिए बालक शिशु को प्रधानता देने का कोई कारण नजर नहीं आता।
एक शिल्पकार प्रतिमा बनाने के लिए जैसे पत्थर को कहीं काटता है, कहीं छांटता है, कहीं तल को चिकना करता है, कहीं तराशता है तथा कहीं आवृत को अनावृत करता है, वैसे ही मेरे पूज्य पिताश्री रामस्वरूपजी गर्ग ने मेरे व्यक्तित्व को तराशकर उसे महनीय और सुघड़ रूप प्रदान किया।
हर पिता अपने पुत्र की निषेधात्मक और दुष्प्रवृत्तियों को समाप्त करके नया जीवन प्रदान करता है। पिता हर संतान के लिए एक प्रेरणा हैं, एक प्रकाश हैं और संवेदनाओं के पुंज हैं।
पिता आंसुओं और मुस्कान का एक समुच्चय है, जो बेटे के दु:ख में रोता तो सुख में हँसता है। उसे आसमान छूता देख अपने को कद्दावर मानता है तो राह भटकते देख अपनी किस्मत की बुरी लकीरों को कोसता है। पिता गंगोत्री की वह बूंद है जो गंगा सागर तक एक-एक तट, एक-एक घाट को पवित्र करने के लिए धोता रहता है। पिता वह आग है जो घड़े को पकाता है, लेकिन जलाता नहीं जरा भी। वह ऐसी चिंगारी है जो जरूरत के वक्त बेटे को शोले में तब्दील करता है। वह ऐसा सूरज है, जो सुबह पक्षियों के कलरव के साथ धरती पर हलचल शुरू करता है, दोपहर में तपता है और शाम को धीरे से चाँद को लिए रास्ता छोड़ देता है। पिता समंदर के जैसा भी है, जिसकी सतह पर असंख्य लहरें खेलती हैं, तो जिसकी गहराई में खामोशी ही खामोशी है।
‘पिता!’ का स्नेह, अपनेपन के तेज और स्पर्श को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता है, उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है। वह विलक्षण, साहस और संस्कारदाता होता है। जो समस्त परिवार को आदर्श संस्कार ही नहीं देता, बल्कि जीवन निर्वाह के साधन उपलब्ध कराता है। उनके दिए गए संस्कार ही संतान की मूल थाती होती है। इसीलिये पिता के चरणों में भी स्वर्ग कहा गया है, क्योंकि वे हर क्षण परिवार एवं संतान के लिए छाया की भांति एक बड़ा सहारा बनते हैं और उनका रक्षा कवच परिवारजनों के जीवन को अनेक संकटों से बचाता है। आज हमें ऐसे पिताओं की जरूरत नहीं जो वर्चस्व स्थापित करके पत्नी एवं बच्चों पर आधिपत्य जमाते हैं, बल्कि ऐसे पिताओं की आवश्यकता है जो उनके विचारों और इच्छाओं को न केवल प्रमुखता देते हैं बल्कि उनके सपनों को उड़ान भरने की ताकत भी देते हैं। जीवन में जब भी निर्माण की आवाज उठेगी, पौरुष की मशाल जगेगी, सत्य की आँख खुलेगी तब हम, हमारा वो सब कुछ जिससे हम जुड़े होंगे, वो सब पिता का कीमती तौहफा होगा। इस अहसास को जीवंत करके ही हम पिता-दिवस को मनाने की सार्थकता पा सकेंगे।