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प्रेम अधूरा ही है

हेमराज ठाकुर
मंडी (हिमाचल प्रदेश)
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प्रेम अन्त अभिलाषा है जीवन की,
पर मिला वह सबको अधूरा ही है
राम-कृष्ण की कहानी को सुन लो,
उनमें भी कौन-सा वह पूरा ही है ?

यह रही दास्तां यूँ ही है जीवन की,
हर युग में और हर जिंदगानी में
राधा-कृष्ण का मेल हुआ कहां ?
राम-सिया भी बिछुड़े नादानी में।

हुआ मुकम्मल न स्वप्न किसी का,
प्रेम की चाहें ही सबकी अधूरी रही
भले ही प्रेयसी राधा थी या सीता थी,
अधूरेपन की पीड़ा तो है सबने सही।

मूर्तिमान हुआ प्रेम किसका कहां है ?
जिसकी अभिलाषा हम सब करते हैं
अधूरा-सा मिला है जो भी हम सबको,
उसे खोने से भी सब कितना डरते हैं ?

जी लेते हैं जिंदगी हम पूरी हर रिश्ते में,
पर हर रिश्ते में देखें तो प्रेम अधूरा ही है
कई-कई विवाह से भी कहां प्यास बुझी ?
अवतारों के जीवन में भी प्रेम कहाँ पूरा है ?

जिन्दगी जद्दोजहद है प्रेम और वासनाओं की,
लोग सकून कहाँ किसी को यहाँ लेने देते हैं ?
यह संसार तो है बीहड़ घाटी नित कर्मों की,
यहाँ अवतारों की भी परीक्षा लोग ले लेते हैं।

यह सच है कि प्रेम जरूरत है हर जीवन की,
भाषा प्रेम की पशु-पक्षी को भी समझ आती है।
जिन्दगी के तमाम उम्र के सिलसिले में हर सम्भव,
प्रेम के अधूरेपन की पीड़ा हमेशा सबको सताती है।

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