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बचपन

सुरेन्द्र सिंह राजपूत हमसफ़र
देवास (मध्यप्रदेश)
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हुआ यूँ कि रोज की तरह आज भी मैं डयूटी जाने के लिए अपनी बाईक से घर से निकला। जैसे ही मुख्य सड़क पर आया,सड़क किनारे खड़े दो छोटे- छोटे बच्चों ने मुझसे बस स्टैण्ड तक ले चलने के लिए लिफ़्ट मांगी। उनके लिफ़्ट मांगने के तरीक़े से ही समझ में आ गया था कि ज़रूर ये ज़िन्दगी की जंग से जूझने वाले कम उम्र में बड़े हो गए बच्चे हैं।
मैंने गाड़ी रोकी और सहज भाव से पूछा कि-एक को जाना है या दोनों को ?
दोनों एकसाथ बोले-अंकल दोनों को जाना है।
मैंने कहा-बैठ जाओ।
दोनों बच्चे बैठ गए। उनके चेहरे पर ऐसी ख़ुशी झलक रही थी जैसे ओलंपिक के पदक का पहला चरण पार कर लिया हो। मैंने पूछा-क्या नाम है तुम्हारा ?
बड़ा बच्चा बोला-अंकल जी,मेरा नाम राहुल है,और इसका रमेश।
मैंने पूछा-कहाँ रहते हो ?
बड़ा बच्चा बोला-जमना नगर।
मैंने अगला प्रश्न किया-बस स्टैण्ड क्यों जा रहे हो ?
बड़ा बच्चा बोला-अंकल जी,हम वहां बसों में मूंगफली के पैकेट बेचते हैं।
मैंने पूछा-विद्यालय नहीं जाते ?
वे बोले-जाते हैं,पर अभी गर्मी की छुट्टी चल रही है।
मेरा प्रश्न-कौन-कौन-सी कक्षा में पड़ते हो ?
बड़ा लड़का-मैं पाँचवी में और ये तीसरी में।
मेरा प्रश्न-सरकारी विद्यालय में ?
दोनों बच्चे-हाँ अंकल।
मेरा प्रश्न-मूंगफली बेचकर कितने पैसे कमाते हो ?
बड़ा लड़का-ठेकेदार गिन-गिन कर पैकेट देता है, सुबह आठ से शाम सात तक के १५० रुपए।
मैंने पूछा-तुम्हारे पापा क्या करते हैं ?
बड़ा बच्चा-वो मंडी में हम्माली करते हैं।
इतने में स्टैण्ड नज़दीक आ गया था।
बड़ा बच्चा बोला-बस अंकल जी हमें यहीं उतार दो।
मैंने गाड़ी रोकी,दोनों बच्चे अपने चेहरे पे हल्की-सी मुस्कान लिए मुझे थैंक्यू बोले…और ओझल हो गए,लेकिन मेरे ज़ेहन में कई सवाल छोड़ गए। पहला सवाल तो यही था कि,बाल श्रम पर रोक लगाने वाला कानून बड़ा है ? या इनकी मज़बूरी ?
मैं उज्जैन चौराहे पर नियत स्थान पर अपनी बाईक खड़ी कर डयूटी जाने के लिए बस में बैठा…उन बच्चों के बारे में सोच कर मेरी आँखें अश्रुपूरित हो चुकी हैं…क्योंकि उनका संघर्ष भरा बचपन देखकर मुझे अपना बचपन याद आ गया.. जब मैं कक्षा आठवीं में पढ़ता था और पिताजी का देहांत हो गया था। उनके चले जाने के बाद मैं किस तरह शाला की पढ़ाई करते हुए अतिरिक्त समय और गर्मी की छुट्टियों में काम करके दो पैसे कमाता था….। बस स्टैण्ड पर बस आते ही बेबस बच्चे भीषण गर्मी में दौड़-दौड़कर मुसाफ़िरों को मूँगफली खरीदने का आग्रह करते हैं..ये वो शिक्षा प्राप्त कर रहे थे जो दुनिया के किसी विद्यालय,किसी महाविद्यालय या किसी कोचिंग संस्थान में नहीं सिखाई जाती। कुछ ऐसी ही शिक्षा परिस्थितियों ने मुझे भी सिखाई थी मैं महाविद्यालय में पढ़कर तो स्नातक नहीं बन सका,लेकिन ज़िन्दगी ने परिस्थितियों के महाविद्यालय में ज़रूर स्नातक करा दिया था।

परिचय-सुरेन्द्र सिंह राजपूत का साहित्यिक उपनाम ‘हमसफ़र’ है। २६ सितम्बर १९६४ को सीहोर (मध्यप्रदेश) में आपका जन्म हुआ है। वर्तमान में मक्सी रोड देवास (मध्यप्रदेश) स्थित आवास नगर में स्थाई रूप से बसे हुए हैं। भाषा ज्ञान हिन्दी का रखते हैं। मध्यप्रदेश के वासी श्री राजपूत की शिक्षा-बी.कॉम. एवं तकनीकी शिक्षा(आई.टी.आई.) है।कार्यक्षेत्र-शासकीय नौकरी (उज्जैन) है। सामाजिक गतिविधि में देवास में कुछ संस्थाओं में पद का निर्वहन कर रहे हैं। आप राष्ट्र चिन्तन एवं देशहित में काव्य लेखन सहित महाविद्यालय में विद्यार्थियों को सद्कार्यों के लिए प्रेरित-उत्साहित करते हैं। लेखन विधा-व्यंग्य,गीत,लेख,मुक्तक तथा लघुकथा है। १० साझा संकलनों में रचनाओं का प्रकाशन हो चुका है तो अनेक रचनाओं का प्रकाशन पत्र-पत्रिकाओं में भी जारी है। प्राप्त सम्मान-पुरस्कार में अनेक साहित्य संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया है। इसमें मुख्य-डॉ.कविता किरण सम्मान-२०१६, ‘आगमन’ सम्मान-२०१५,स्वतंत्र सम्मान-२०१७ और साहित्य सृजन सम्मान-२०१८( नेपाल)हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्य लेखन से प्राप्त अनेक सम्मान,आकाशवाणी इन्दौर पर रचना पाठ व न्यूज़ चैनल पर प्रसारित ‘कवि दरबार’ में प्रस्तुति है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-समाज और राष्ट्र की प्रगति यानि ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-मुंशी प्रेमचंद, मैथिलीशरण गुप्त,सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ एवं कवि गोपालदास ‘नीरज’ हैं। प्रेरणा पुंज-सर्वप्रथम माँ वीणा वादिनी की कृपा और डॉ.कविता किरण,शशिकान्त यादव सहित अनेक क़लमकार हैं। विशेषज्ञता-सरल,सहज राष्ट्र के लिए समर्पित और अपने लक्ष्य प्राप्ति के लिये जुनूनी हैं। देश और हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार-
“माँ और मातृभूमि स्वर्ग से बढ़कर होती है,हमें अपनी मातृभाषा हिन्दी और मातृभूमि भारत के लिए तन-मन-धन से सपर्पित रहना चाहिए।”

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