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बहार आते चमन हँसेगा

अवधेश कुमार ‘आशुतोष’
खगड़िया (बिहार)
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(रचना शिल्प: १२१ १२१ १२१ २२)

बहार आते चमन हँसेगा,
कली-कली से सुमन खिलेगाl

चढ़ा क्षितिज पर लिए चमक जो,
भरी दुपहरी भुवन दहेगाl

जला दिया जो जनक दुलारी,
उसे पिता कब सहन करेगाl

करे पढ़ाई लगन लगाकर,
उसे समझ लो गगन चढ़ेगाl

अगर ये जिह्वा रहे न वश में,
यही समझ लो मदन छलेगाl

अलग रखो तुम सदा फ़िकर को,
वरन तुम्हारा बदन गलेगाl

जहाँ रहेगा विपिन शजर का,
वहाँ सदा घन सघन मिलेगाl

पिया मिलन की लगन लगी हो,
उसी हृदय में अगन जलेगाll

परिचय-अवधेश कुमार का साहित्यिक उपनाम-आशुतोष है। जन्म तारीख २० अक्टूबर १९६५ और जन्म स्थान- खगरिया है। आप वर्तमान में खगड़िया (जमशेदपुर) में निवासरत हैं। हिंदी-अंग्रेजी भाषा का ज्ञान रखने वाले आशुतोष जी का राज्य-बिहार-झारखंड है। शिक्षा असैनिक अभियंत्रण में बी. टेक. एवं कार्यक्षेत्र-लेखन है। सामाजिक गतिविधि के निमित्त साहित्यिक गतिविधियों में भाग लेते रहते हैं। लेखन विधा-पद्य(कुंडलिया,दोहा,मुक्त कविता) है। इनकी पुस्तक प्रकाशित हो चुकी है, जिसमें-कस्तूरी कुंडल बसे(कुंडलिया) तथा मन मंदिर कान्हा बसे(दोहा)है। कई रचनाओं का प्रकाशन विविध पत्र- पत्रिकाओं में हुआ है। राजभाषा हिंदी की ओर से ‘कस्तूरी कुंडल बसे’ पुस्तक को अनुदान मिलना सम्मान है तो रेणु पुरस्कार और रजत पुरस्कार से भी सम्मानित हुए हैं। इनकी लेखनी का उद्देश्य-साहित्य सेवा करना है। आपके लिए प्रेरणा पुंज-हिंदी की साहित्यिक पुस्तकें हैं। विशेषज्ञता-छंद बद्ध रचना (विशेषकर कुंडलिया)में है।