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भारत की नैतिकता का प्रतीक मानवता

हरिहर सिंह चौहान
इन्दौर (मध्यप्रदेश )
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विश्वास: मानवता, धर्म और राजनीति…

मानवता हमेशा से नैतिकता का प्रतीक रही है। हमारे देश की बहुमूल्य धरोहर ही यही है। एक-दूसरे के अटूट विश्वास को समय के अनुरूप ढालना बहुत बड़ी बात है। आक्रांताओं द्वारा आंतक के अनगिनत प्रहार किए गए, देश के दुश्मनों ने हमारी आस्था पर चोट की, आराधना स्थलों पर तोड़-फोड़ की गई। इतना होने के बाद भी हमारे अंदर बदले की भावना नहीं आई। कीचड़ में कितने भी पत्थर मारो, गंदगी उसी के ऊपर उड़ती है, जो पत्थर मारते हैं। हम सदियों से गुलामी की जंजीरों में जकड़े रहे, पर हमारी मानवीय जिम्मेदारी, परम्परा और विश्वास कभी भी कमजोर नहीं हुआ, क्योंकि हमारे धर्म में नकारात्मक पहलू की कोई भी जगह नहीं है। इसी शिक्षा के चलते राजनीति में हमारे जनप्रतिनिधिगण पूरे विश्व में भारत का लोहा मनवा रहे हैं। भारत आज विश्व की चौथी महाशक्ति बनने के लिए आगे बढ़ रहा है। हमारे परम्परागत तीज-त्योहार-पर्व भी सभी पंथ-सम्प्रदाय-जात-पात को साथ लेकर चलना, सभी धर्मों का सम्मान करना भी हमारा कर्त्तव्य है। आधुनिकता व पश्चिमी सभ्यता के लाख पहाड़ खड़े हो जाएं, संस्कृति में कितना भी नयापन आ जाए, पर जो भारतीयता है, जो ममता है, स्नेह व विश्वास है, वह सभी में जब तक रहेगा, तब तक हम राह भटक नहीं सकते हैं।
अपनी सभ्यता-संस्कृति से हम भारतीयों का जीवन बहुत ज्यादा खुशहाल है। सिक्के के दोनों पहलू पर खुलकर संवाद होना चाहिए, यह हमारी जिम्मेदारी भी है और इससे हमारा मनोबल भी ऊँचा रहता है। परम्परा के अनुरुप राजनीति में धर्म का समन्वय विश्वास की अलख जगाने हेतु आईने का काम करता है। विचारधाराओं के अनगिनत भँवर में समन्वय और विश्वास कभी भी खत्म नहीं होता। वहीं मानवता का सच्चा हमदर्द हमारी संवेदनाएं हैं, जिससे हम एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। एकता-भाईचारे से ही भारत का मान-सम्मान है। तभी तो कितनी भी परेशानी आ जाए, हर तकलीफ़ में हम भारतीयों की एकजुटता ही प्रबल दावे को मजबूत बनाने में मदद करती है। भारतीय विचारों में किसी के साथ नापाक इरादे से कुछ भी गलत नहीं होता, दुश्मन लाख कोशिश कर ले, हमारे गुलशन को कोई भी मिटा नहीं सकता। हमारी यही सम्प्रभुता संविधान के साथ चलकर मूलभूत आवश्यकता के साथ राष्ट्र के स्वाभिमान को जीवित रखे हुए है। हम भारतीयों की धर्म की ताकत और एक-दूसरे से प्यार-स्नेह-विश्वास के मर्म से सम्वेदना अभी भी जिंदा है। हम जब आज विश्व पटल पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं, तो यह हमारे पुरखों का पुण्य-प्रताप व हम भारतीयों का पुण्य उदय है, जो विश्व गुरु भारत को आगे बढ़ाता जा रहा है। तभी तो विश्व में सबसे बड़ी व शक्तिशाली महाशक्ति में हम भी किसी से कम नहीं हैं। हम मानव सेवा में अहिंसा से धर्म के ध्वज को लेकर विश्वास के साथ हर एक क्षेत्र में भारत का भविष्य उज्ज्वल करने के लिए प्रगति पथ पर अग्रसर हैं।