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भारत में हिन्दी भाषा का स्थान

रत्ना बापुली
लखनऊ (उत्तरप्रदेश)
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हिन्दी संग हम….

भारत की आधी आबादी द्वारा वाली बोली जाने वाली भाषा को दोयम दर्जे पर रखा जाता है, जबकि एक विदेशी भाषा को भारत के हर राज्य में प्राथमिकता दी जाती है।
पूर्वोत्तर क्षेत्र की भाषा की जननी संस्कृत ही है, जिसमें हमारे प्राचीनकाल की ऋचाएँ, संहिता, महाभारत, भाष्य भी लिखा गया है और जिसका मात्र आध्यात्मिक महत्व ही नहीं, वरन् धार्मिक-सामाजिक महत्व भी है। फिर इसी से उत्पन्न हिन्दी भाषा आज भी क्यों उपेक्षित है ?
भारत अनेक भाषा-भाषियों का देश है। इन सभी भाषा-भाषियों में हिन्दी भाषा को प्रतिष्ठापित करना कष्टदायक तो है ही, कारण कि सभी अपनी-अपनी भाषा को प्राथमिकता देने की होड़ में लगे हुए हैं। इस परिस्थिति में अँग्रेजी के आगमन ने हमारी हिन्दी भाषा को जड़ से काटने की चेष्टा की, अतः इस बन्दर बाँट में सबसे ज़्यादा नुकसान हिन्दी भाषा को ही हुआ। कुछ हमारे भारत में रहने वाले अँग्रेजों के पिट्ठुओं ने अँग्रेजी को श्रेष्ठ पदवी देकर हिन्दी को अपने ही देश में अभारतीय बना दिया।
लार्ड मैकाले की शिक्षा नीति ने अँग्रेजी का ऐसा शंखनाद फूँका कि, आधी से ज्यादा जनता अँग्रेजी शिक्षा की मुरीद हो गई। कुछ आर्थिक परिस्थितियों ने भी इसमें घी का काम करते हुए जगह-जगह अँग्रेजी माध्यम से शिक्षा संस्थान की स्थापना की और संस्कृत एवं हिन्दी भाषा से समृद्ध गुरु-कुल को अभारतीयता का दर्जा दे दिया।
भारत को प्रेम करने वाले राष्ट्रीय महानुभावों को जब तक इसका ज्ञान हुआ, तब तक बहुत देर हो चुकी थी और अँग्रेजी भाषा ने अपना रंग जमा दिया था।
यहाँ स्वामी विवेकानन्द जी की कही बात उद्धृत करना चाहूँगी,- “भारत रत्नों से भरा हुआ एक मिट्टी का बक्सा है, जबकि विदेश मिट्टी से भरा हुआ सोने का बक्सा है।” आज हम यह अनुभव कर रहे हैं कि, हमारे देश की उन पुस्तकों का कितना महत्व है, जिसमें विज्ञान, भूगोल, गणित सभी समाहित थे और है, पर ‘घर की मुर्गी दाल बराबर’ कहावत के अनुसार हमने उसको कोई तवज्जो नहीं दी और अँग्रेजी शिक्षा के पीछे भागते रहे हैं।
आज भी ९० प्रतिशत शिक्षा या बच्चे अँग्रेजी माध्यम से पढ़ते हुए गौरवान्वित महसूस करते हैं, जबकि हिन्दी भाषा उन्हें कठिन लगती है। यह सच जानते हुए भी कि, मातृभाषा हमारी हिन्दी है।
यह हिन्दी का दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है कि, हिन्दी भाषा-भाषी ही इसे नकार रहे हैं, जबकि शत-प्रतिशत सत्य है कि, हिन्दी की उन्नति के लिए जितना अहिन्दी भाषा-भाषी के लोगों ने प्रयत्न किया, उतना हिन्दी भाषा को जानने वाले लोगों ने नहीं। उदाहरण स्वरूप राजा राममोहन राय, दयानन्द सरस्वती, केशवचन्द्र सेन, बंकिम चन्द्र, अय्यर कस्तूरी रंगा व बाल गंगाधर तिलक आदि। यह हिन्दीभाषी नहीं थे, पर हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए बल दिया।
मैं स्वयं बंगाली (मातृभाषा बंगाली) हूँ, परन्तु हिन्दी मेरी प्रेमी भाषा है।
हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए सर्वाधिक समर्थन जिन लोगों ने किया, उनमें २ नाम विशेष उल्लेखनीय हैं-तमिल भाषी न्यायाधीश कृष्ण स्वामी अय्यर तथा बंगलाभाषी शारदा चरण मित्र। अपने हृदय की वेदना इन पंक्तियों में व्यक्त कर रही हूँ-
‘अरे ओ हिन्दी भाषी,
क्यों चाट रहे अँग्रेजी की थाली।
वसन पहन लो चाहे मंहगा,
रहेगा हाथ खाली ही खाली।

बूढ़े लोगों की होगी भरमार,
बेटे सभी जाएँगे विदेश।
अपने देश में बचा रहेगा,
केवल क्लेश ही क्लेश॥