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‘भोग की वस्तु’ समझना बेहद चिंताजनक

ललित गर्ग
दिल्ली
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दुनियाभर में बालिकाओं की बेचारगी को दूर करने, सुरक्षित एवं सम्मानपूर्ण जीवन प्रदत्त करने, उनके सेहतमंद जीवन से लेकर शिक्षा और करियर के लिए मार्ग बनाने के उद्देश्य से हर साल अक्तूबर में ‘अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस: मनाया जाता है। इस दिन अधिकारों, सुरक्षित जीवन और सशक्तिकरण के प्रति जागरूक किया जाता है। भारत समेत कई देशों में बालिकाओं को कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। एक बच्ची के जन्म से लेकर परिवार में उसकी स्थिति, शिक्षा के अधिकार और करियर में बालिकाओं के विकास में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए जागरूकता फैलाना ही इसका उद्देश्य है। एक गैर सरकारी संगठन ने प्लान इंटरनेशनल प्रोजेक्ट के रूप में अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस मनाने की शुरुआत की। कनाडा सरकार ने एक आम सभा में ‘अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस’ मनाने का प्रस्ताव रखा। १९ दिसंबर २०११ के दिन संयुक्त राष्ट्र ने इस प्रस्ताव को पारित किया।
आज दुनिया में कन्याओं एवं बालिकाओं के समग्र विकास के साथ उनके जीवन को सुरक्षित करना ज्यादा जरूरी है, क्योंकि छोटी बालिकाओं पर हो रहे अन्याय, अत्याचारों की एक लंबी सूची रोज बन सकती है। न मालूम कितनी अबोध बालिकाएं, कब तक ऐसे जुल्मों का शिकार होती रहेंगी। कब तक अपनी मजबूरी का फायदा उठाने देती रहेंगी। सख्त कानूनों के बावजूद, देश में हर १५ मिनट पर १ बालिका यौन अपराध का शिकार होती है। निर्भया मामले में जनांदोलन के बाद सख्त कानून बनने के बावजूद देश में बलात्कार एवं बाल-दुष्कर्म मामलों में भारी बढ़ोतरी हुई है। सुझाव दिए गए हैं कि, शालेय पाठयक्रमों में यौन शिक्षा को शामिल किया जाए, लेकिन संस्कृति और परंपरा आदि का हवाला देकर इस तरह के विचारों को दरकिनार किया जाता रहा है, जबकि संवेदनशील तरीके से की गई यौन शिक्षा की व्यवस्था बच्चों को अपने शरीर और उसके साथ होने वाली हरकत को समझने और समय पर उससे बचने या विरोध करने में मददगार साबित हो सकती है।
इस खास दिन मनाने का मुख्य उद्देश्य बालिकाओं को आत्मनिर्भर बनाना है, ताकि महिलाएं भी देश और समाज के विकास में योगदान दे सकें।
बालिका शिशु के साथ भेद-भाव एक बड़ी समस्या है जो कई क्षेत्रों में फैला है जैसे शिक्षा में असमानता, पोषण, कानूनी अधिकार, चिकित्सीय देख-रेख, सुरक्षा, सम्मान, बाल विवाह आदि। बहुत जरूरी है कि, विभिन्न प्रकार के समाजिक भेदभाव और शोषण को समाज से पूरी तरह से हटाया जाए, जिसका हर रोज लड़कियाँ सामना करती हैं।
समाज में व्याप्त अत्यधिक गरीबी ने बालिकाओं के खिलाफ सामाजिक बुराई जैसे दहेज प्रथा को जन्म दिया है, जिसने बालिकाओं की स्थिति को बद से बदतर बना दिया है। आमतौर पर माता-पिता सोचते हैं कि, लड़कियाँ केवल रुपए खर्च कराती है, जिसके कारण वो लड़कियों को बहुत से तरीकों (कन्या भ्रूण हत्या, दहेज के लिये हत्या) से जन्म से पहले या बाद में मार देते हैं, कन्याओं या महिलाओं को बचाने के लिए ये मुद्दे समाज से बहुत शीघ्र खत्म करने की आवश्यकता है। हम तालिबान-अफगानिस्तान आदि देशों में बच्चियों एवं महिलाओं पर हो रही क्रूरता, बर्बरता, शोषण की चर्चाओं में मशगूल दिखाई देते हैं, लेकिन भारत में आए दिन नाबालिग बच्चियों और वृद्ध महिलाओं तक से होने वाली छेड़छाड़, बलात्कार, हिंसा की घटनाएं पर क्यों मौन साध लेते हैं ? इस देश में जहां नवरात्र में कन्या पूजन किया जाता है, लोग कन्याओं को घर बुलाकर उनके पैर धोते हैं और उन्हें यथासंभव उपहार देकर देवी माँ को प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं, वहीं इसी देश में बेटियों को गर्भ में ही मारने से नारी अस्मिता एवं अस्तित्व को नोंचने की त्रासदी भी है। इन दोनों कृत्यों में कोई भी तो समानता नहीं, बल्कि गज़ब का विरोधाभास दिखाई देता है।
दुनियाभर और हमारे देश में भी बालिकाओं की स्थिति, कन्या भ्रूण हत्या की बढ़ती घटनाएं, लड़कियों की तुलना में लड़कों की बढ़ती संख्या, तलाक के बढ़ते मामले, गाँवों में बालिका की अशिक्षा, कुपोषण एवं शोषण, बालिकाओं की सुरक्षा, बालिकाओं के साथ होने वाली बलात्कार की घटनाएं, अश्लील हरकतें और विशेष रूप से उनके खिलाफ होने वाले अपराधों पर प्रभावी चर्चा एवं कठोर निर्णयों से एक सार्थक वातावरण का निर्माण किए जाने की अपेक्षा है, क्योंकि एक टीस-सी मन में उठती है कि आखिर बालिकाएं कब तक भोग की वस्तु बनी रहेंगी ? उसका जीवन कब तक खतरों से घिरा रहेगा ? बलात्कार, छेड़खानी, भ्रूण हत्या और दहेज की धधकती आग में वह कब तक भस्म होती रहेगी ?
दरअसल, छोटी लड़कियों या महिलाओं की स्थिति अनेक मुस्लिम और अफ्रीकी देशों में दयनीय है, जबकि अनेक मुस्लिम देशों में महिलाओं पर अत्याचार करने वालों के लिए सख्त सजा का प्रावधान है, अफगानिस्तान-तालिबान का अपवाद है। वहां के तालिबानी शासकों ने जो फरमान जारी किए हैं, वो महिला-विरोधी होने के साथ दिल को दहलाने वाले हैं। नए फरमानों के अनुसार बिना बुर्के या बिना अपने मर्द के साथ घर से बाहर निकलने वाली महिलाओं-बालिकाओं को गोली मार दी जाएगी। इतने कठोर, क्रूर, बर्बर और अमानवीय कानून लागू हो जाने के बावजूद अफगानिस्तान की पढ़ी-लिखी और जागरूक महिलाएं बिना डरे सड़कों पर जगह-जगह प्रदर्शन कर रही हैं। दुनिया की बड़ी शक्तियों को इन बालिकाओं के स्वतंत्र अस्तित्व को बचाने के लिए आगे आना चाहिए।
तमाम जागरूकता एवं सरकारी प्रयासों के भारत में भी बालिकाओं की स्थिति में यथोचित बदलाव नहीं आया है। भारत में भी जब कुछ धर्म के ठेकेदार हिंसात्मक और आक्रामक तरीकों से बालिकाओं को सार्वजनिक जगहों पर नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं, तो वे भी तालिबानी ही नजर आते हैं। विरोधाभासी बात यह है कि, जो लोग बालिकाओं को संस्कारों की सीख देते हैं, उनमें से बहुत से लोग, धर्मगुरु, राजनेता एवं समाजसुधारक महिलाओं एवं बालिकाओं के प्रति कितनी कुत्सित मानसिकता का परिचय देते आए हैं, यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है। इनके चरित्र का दोहरापन जगजाहिर हो चुका है। कोई क्या पहने, क्या खाए, किससे प्रेम करे और किससे शादी करें, सह-शिक्षा का विरोधी नजरिया-इस तरह की पुरुषवादी सोच के तहत बालिकाओं को उनके हक से वंचित किया जा रहा है, उन पर तरह-तरह की बंदिशें एवं पहरे लगाए जा रहे हैं। ‘यत्र पूज्यंते नार्यस्तु तत्र रमन्ते देवता’-जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं, किंतु आज हम देखते हैं कि नारी का हर जगह अपमान होता चला जा रहा है। उसे ‘भोग की वस्तु’ समझकर आदमी ‘अपने तरीके’ से ‘इस्तेमाल’ कर रहा है, यह बेहद चिंताजनक बात है। आज देश में सामूहिक दुष्कर्म की वारदातों में कमी भले ही आई हो, लेकिन उन घटनाओं का रह-रह कर सामने आना त्रासद एवं दुःखद है।