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महंगाई की मार, आम आदमी बेजार

नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद (झारखंड)
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महंगाई की मार, मार गई,
परेशान हो गया आम आदमी
अब कैसे चले यह जीवन की गाड़ी,
आसमान छू रही सभी चीजों की कीमत भी।

आम आदमी की पहुँच से, दूर-दूर काफी,
कैसे करें सामना महंगाई से भी
कैसे पार करें हम जीवन की नैया अपनी,
नहीं कुछ भी बचत, आय-व्यय में असमानता बढ़ी।

इससे जीना भी मुश्किल हो गया काफी,
जनसंख्या और वस्तुओं में काफी अन्तर है आया
उत्पादन और आपूर्ति में भी भारी अन्तर रहा,
जिससे आम आदमी की आय-व्यय में असंतुलन भारी।

रसोई का बजट बिगाड़ दिया खाद्य सामग्री की कीमत ने,
बढ़ी कीमत ने आम आदमी की बचत बिगाड़ी
आज जीना मुश्किल हो गया, इतनी महंगाई,
जमाखोरी, कालाबाजारी, बिचौलिए और मुनाफाखोरी।

इन सभी से कृत्रिम कमी होती रही,
लागत में बेहताशा वृद्धि, जिससे लागत खर्च बढ़ा
आग रूप से बढ़ती अग्नि हो गई मानव की,
एल.पी.जी. गैस सिलेंडर में कीमत बड़ी बेतहाशा ही।

कैसे पार लगेगा बुढ़ापा, गैस के बिना रसोई में जी,
निम्न वर्ग और मध्यजीवी को ही मुश्किल पड़ी
जीना दूभर हो गया इस महंगाई की मार से ही,
महंगाई मार गई, महंगाई मार गई।

टूट रहे सपने सारे जीवन के,
सरकारी सहायता मिलती है गरीबों को कुछ ही
भूखे मरने नहीं देती सहायता सरकार की,
खाना, अनाज, कपड़ा, मकान की सुविधा सरकार देती।

जब सारी दुनिया में है महंगाई,
समाधान खोजना भी जरूरी।
सभी सरकारें मिल कर प्रयास करें, तो निश्चय ही महंगाई जाएगी, महंगाई जाएगी॥