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मेघा रे….

डॉ. कुमारी कुन्दन
पटना(बिहार)
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ओ मेघा रे…

ओ मेघा रे,ओ मेघा ना तरसा रे
अब तो सुधा रस बरसा जा रे
तपती धरती राह देखती,
पवन अगन बरसाए रे।

जीव-जन्तु दुखी त्रस्त पड़े हैं,
पथिक सब भी हुए बेहाल
कृषक आकाश को देख रहे,
तू जरा देख धरा का हाल।

नदी और ताल-तलैया सूखे,
सूखे पनघट फूल-फुलवारी
तुम बिन चैन नहीं ये पाए,
बरस जाओ बदरिया कारी।

क्या तुम जन-जन से रूठी,
फूलों और कलियों से रूठी
सब बेबस-लाचार हुए हैं,
धरती हरी चुनरी को रूठी।

सुधा रस इतनी बरसा दे,
इन्द्रधनुषी छटा बिखरा दे
रोम-रोम पुलकित कर दे,
सबका हृदय पुष्प खिला दे।

शीतल कर दे सबकी काया,
खुशियाँ दे दे अब तू अपार।
दुखी व्यथित सब जन हुए,
जीवन में आ जाए बहार॥