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मेरा कसूर क्या है ?

आचार्य गोपाल जी ‘आजाद अकेला बरबीघा वाले’
शेखपुरा(बिहार)
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मेरे दिल में बसता है हिंद महान तो मेरा कसूर क्या है ?
मुझे मेरे देश में दिखती है जन्नत तो मेरा कसूर क्या है ?

नफरत के बीज बो रहे हैं दिन-रात राहगीर प्रेम के,
मुझे दिखता है इंसान में इंसान तो मेरा कसूर क्या है ?

दौलत से क्या कोई कभी खरीद पाया किसी का प्यार,
उसे लगता है बिकता है हर सामान तो मेरा कसूर क्या है ?

हर वक्त चढ़ाते चश्मा सभी को वो सांप्रदायिकता का,
मुझे एक ही दिखता है हिंदुस्तान तो मेरा कसूर क्या है ?

अपनी बातों से बना लेते हैं वे सबको अपना मुरीद,
वो रखते हैं पलटने वाली जबान तो मेरा कसूर क्या है ?

ऊंची उड़ान पर पाबंदी लगाते हैं हमेशा सभी को वे,
मैं रखता हूँ ख्यालों में आसमान तो मेरा कसूर क्या है ?

नफ़रत फ़रेब की चाक-चौबंद बनाते रहते हैं सदन,
बनाता हूँ सच्ची रूहों से गुलिस्तान तो मेरा कसूर क्या है ?

माना है वह शासक-प्रशासक अपने आजाद भारत के,
मैं हूँ शोषित,शोणित घूंट पीने वाला तो मेरा कसूर क्या है ?

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