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मेरे नाना

प्रज्ञा गौतम ‘वर्तिका’
कोटा(राजस्थान)
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बहुत याद आते हैं नाना,जिनके सानिध्य-छाँव में बचपन के अनेक वर्ष बीतेl मन की अतल गहराइयों में दबी,पीले और भंगुर पृष्ठों पर उकेरी हुई रंग उड़ी चित्रकथाओं-सी बचपन की स्मृतियाँl एक धुंधली-सी स्मृतिl पांच वर्ष की छोटी-सी बच्ची मैं,नाना की उंगली थामे बाज़ार से गुजर रही हूँl कोई सज्जन रास्ते में मिले और पूछते हैं-“कौन-सी कक्षा में पढ़ती हो बेटा ?” और नाना मेरे बोलने के पहले बोल पड़ते हैं-“छठी कक्षा मेंl” सज्जन आश्चर्य से मुझे देखते हैं और मैं नाना का मुँह देखती हूँl नाना मुझे उछाल कर गोद में ले लेते हैं और गर्व से कहते हैं-“पढ़ती तो कक्षा एक में है, किन्तु ज्ञान कक्षा छः जितना है,आप कुछ भी पूछ लीजियेl” मैं फूल कर कुप्पा हो जाती हूँl प्रथम बार अभिमान की अनुभूति समय की अनेक परतों के बीच आज भी सुरक्षित हैl
नाना-नानी के पास मैं अकेली छोटी-सी बच्ची,दिन कुछ स्कूल में और कुछ घर में खेलते-कूदते बीत जाता,लेकिन शाम को मैं बहुत उदास हो जातीl छोटे भाई-बहनों और मम्मी की बहुत याद आतीl फिर नाना जब शाम को बाजार से आते,उनके हाथ में कुछ होताl “क्या लाये हो मेरे लिए ? नयी नंदन!!” मैं पुलक कर उनसे चिपट जातीl नंदन,चम्पक,पराग, और चंदा मामा,जबसे अक्षरों को मिलाकर शब्द पढ़ना सीखा,तबसे ही इन किताबों को अपने आस-पास पायाl इन किताबों की कहानियों और नाना की सुनाई लोककथाओं ने मेरी कल्पना शक्ति को विस्तार दियाl राजा सात वाहन,रानी पिंगला,बोलने वाली कठ-पुतलियों वाले पलंग और शेख- चिल्लियों की कितनी ही कहानियांl बहुत लम्बी-लम्बी कहानियां जो मुझे फंतासी की रोमांचक दुनिया में पहुंचा देतींl वे लाड़ भी बहुत करते,जिस खिलौने पर हाथ रख देती,वह आ जाताl राखी के दिन नाना की गोद में चढ़कर बाजार जाती और सबसे बड़ी,नोटों वाली राखी पसंद करतीl उस समय राखी का बड़ा होना ही उसकी खूबसूरती और बेहतर होने का पैमाना था मेरे लिएl
किताबें पढ़ने का बहुत शौक था उन्हेंl उनकी पुस्तकों का संग्रह मुझे विरासत में मिला,जिनमें साहित्यिक उपन्यासों,ऐतिहासिक नाटकों से लेकर सुरेन्द्र मोहन पाठक के जासूसी उपन्यास तक शामिल थेl अपनी किशोरावस्था के प्रारंभिक दिनों में मैंने ध्रुवस्वामिनी,अनुरागिनीऔर राजेंद्र अवस्थी की अवहेलना उनके ही संग्रह में से पढ़े थेl
गौर-वर्ण,मध्यम कद-काठी और सुन्दर आकृति वाले मेरे नाना युवावस्था में बहुत सक्रिय रहे थेl वे एक अच्छे स्काउट थेl एक-दो स्काउट-गाइड के शिविरों में मैं भी उनके साथ गयी थीl मुझे याद है,एक बार नदी के उस पार पैलेस में शिविर लगा थाl जंगल में बरसात की वह रात्रि और कैम्प-फायर के दौरान किये गये उनके एकाभिनय और नृत्य आज भी मेरी स्मृतियों में ताजा हैंl जंगल-बुक और मोगली से मेरा परिचय भी उस दौरान ही हुआ थाl वे कला-प्रेमी,जीवन से भरे और कुछ रसिक स्वभाव के थेl
हमारे घर गायें थीं,यद्यपि उनकी देखभाल के लिए ग्वाला होता था,फिर भी वे स्वयं अपने हाथों से उन्हें खिलाते,पुचकारते और दूध दुहतेl खराब स्वभाव की गायें जो किसी और को हाथ भी नहीं लगाने देतीं थीं,उन्हें स्नेह से चाटतीं और उन्हीं से दूध दुहातींl हम बच्चों को यह देखकर बहुत अचरज होताl उनका पशु-प्रेम मेरी मम्मी को और हमें विरासत में मिलाl
वे अध्यापक थे,कुछ वर्ष प्रधानाध्यापक भी रहेl अपने समय के लोकप्रिय अध्यापकl उस समय अध्यापकों का बहुत सम्मान थाl यह वह समय था जब निजी स्कूल संस्कृति का जन्म नहीं हुआ थाl कस्बे के सभी समृद्ध, गणमान्य व्यक्तियों और अधिकारियों के बच्चे सरकारी विद्यालयों में पढ़ते थेl कभी उनके साथ विद्यालय जाती तो उनके छात्र मुझे कंधों पर उठाये घूमतेl छोटी होकर भी मैं अनुभव करती थी कि कस्बे में नाना-नानी का बहुत सम्मान हैl धनी और उच्च पदों पर सुशोभित व्यक्ति भी गुरुजी साहब कहकर नतमस्तक होतेl सेवानिवृत्ति के पश्चात घर का अधिकांश काम-काज उन्होंने अपने हाथ में ले लिया थाl हम दोनों बहनें अपने नन्हें- नन्हें हाथों से उनका हाथ बंटातीl नानी को घर का काम-काज अधिक नहीं सुहाता थाl बाद में वे घरेलू कार्यों के ही होकर रह गयेl उनकी अन्य गतिविधियों में सक्रियता और रचनात्मकता समाप्त हो गयी थीl वे हम पर क्रोधित कम ही होते,लेकिन कई बार उनको क्रोध आता तो उस पर नियंत्रण रख पाना उनके लिए कठिन होताl हम दोनों बहनें चारपाई के पीछे साड़ियाँ पहन कर घर-घर खेल रहे होतेl घंटों गुजर जाते,वे जाने कितनी बार हमको आवाज लगाते,पर खेल में मशगूल हमें उनकी आवाज सुनाई नहीं देतीl तब बहुत गुस्सा होते वे हम पर,पर जो भी हो बहुत प्यार करते थे नाना हमेंl जब हम बड़े हो गये,तब भी वे वैसा ही स्नेह लुटाते जैसे हम नन्हीं बच्चियां ही होंl एक दिन जब हमें बाजार से लौटने में देर हो गयी तो वे चिंतातुर होकर घंटों चौराहे पर खड़े हमारी प्रतीक्षा करते रहेl “लड़कियों बहुत देर कर दी तुमनेl मुझे कितनी चिंता हो गयी थीl” उनकी आँखों में गुस्सा और स्नेह दोनों होतेl “हम कोई बच्चे हैं जो गुम जायेंगेl आप भी हद करते हो नानाl” हमारे स्वर में झुंझलाहट होतीl अपनी दुबली-पतली वृद्ध टांगों से कितनी देर खड़े रहे नाना,सोचकर बहुत दुःख होताl नानी से उलट बहुत सरल और अभिमान रहित स्वभाव था उनकाl बहुत व्यवस्थित थेl हर कार्य को बहुत ही सलीके से करते वो,चाहे अलमारी में अखबार जमाकर रखना हो या सर्दियों के बाद ऊनी कपड़े पैक करनाl
अपने जाने के छह माह पहले तक वे बाजार से सब्जी लाना,दूध-चाय बनाना जैसे कार्य कर लेते थेl अंतिम छः माह उनके अस्वस्थता में ही बीते थेl बीच में जैसे ही कुछ स्वस्थ होते,अपने दैनिक कार्य प्रारंभ कर देतेl उनका अंतिम समय अस्पताल में बड़े ही कष्ट में बीताl पापा-मम्मी और मैं बारी-बारी से अस्पताल में उनकी देखभाल करतेl “कब ठीक होंगे मेरे नाना ?” मैंने डॉक्टर से पूछा थाl मेरी आँखों की व्यग्रता और पीड़ा देखकर बुजुर्ग डॉक्टर ने सब अनुमान लगा लियाl “बहुत प्यार करती हो अपने नाना सेl शायद नाना के ही पास रही होl बेटा,इनकी स्थिति शर-शैया पर लेटे भीष्म पितामह जैसी हैl बहुत कष्ट पा रहे हैंl तुम समझ सकती होl”
९ सितम्बर २०१५ को अपने जन्मदिन से ठीक एक दिन पूर्व उन्होंने अंतिम सांस लीl १० सितम्बर को वो अपने ९० वर्ष पूर्ण कर लेतेl उन्होंने भरपूर जीवन जीया,फिर भी उन्हें और जीने की आस थीl अपना जन्मदिन मनाने की आस थीl वे चले गये,पर घर के कोने-कोने में उनकी स्मृतियाँ रह गयींl तार पर सूखते कपड़े,अलमारियों में बंद बेहद करीने से रखा सामानl डायरियां,पर्स,पेन और जतन से संजोयी न जाने कितनी वस्तुएंl भाई की शादी में बनवाया नया सूट,जो मात्र एक बार पहन पाएl अटैची में रखे नए कोरे कपड़े,जो एक बार भी नहीं पहन पाएl
उनके जाने के बाद पहली दीपावली पर हम दोनों बहनें और मम्मी,नानी को लेकर परिचितों के यहाँ मिलने-जुलने गयेl हमें उस दिन घर लौटने में बहुत देर हो गयी थीl शाम घिर आयी थीl लौटते समय अचानक ही दिमाग में विचार कौंधा-बहुत देर हो गयी,अब नाना बाहर ही मिलेंगे और कहेंगे “ओहो,लड़कियों बहुत देर कर दी तुमनेl” पर……….. नाना कहाँ थे अब ???

परिचय-प्रज्ञा गौतम का उपनाम-वर्तिका है। इनकी जन्मतिथि १७ मई एवं जन्म स्थान-कोटा(राजस्थान)है। आपका बसेरा कोटा स्थित महावीर नगर में है। शिक्षा- एम.एस-सी.(वनस्पति विज्ञान)तथा बी.एड. है। प्रज्ञा गौतम का कार्य क्षेत्र-व्याख्याता(जीव विज्ञान) का है। सामाजिक गतिविधि में आप पर्यावरण चेतना का प्रसार करती रहती हैं। आपकी लेखन विधा-कविता,कहानी और आलेख है। पुस्तक प्रकाशन अभी प्रक्रिया में है। 
अनेक प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में कहानियां, कविताएं और लेख प्रकाशित हुए हैं। बात आपको मिले सम्मान की हो तो जिला स्तरीय सर्वश्रेष्ठ शिक्षक सम्मान- २००६ सहित काव्य विभूति सम्मान(महू) प्रमुख हैं। इधर उपलब्धि-दो वर्षीय अल्प काल में विज्ञान लेखिका के रुप में पहचान कायम होना है। प्रज्ञा जी की लेखनी का उद्देश्य-संदेशपरक एवं सार्थक लेखन करते रहना है। विशेषज्ञता विज्ञान कथा और बाल कथा लेखन में है। जीवन में प्रेरणा पुंज-पिता के.एम.गौतम तथा  गुरुजन सर्वश्री आर.सी. चित्तौड़ा, के.एम.भटनागर और पूर्व राष्ट्रपति- वैज्ञानिक डॉ. ए. पी.जे.अब्दुल कलाम हैं। स्वयं की अनेक रचनाओं में से ‘एक खेत की कहानी’ खुद को बहुत पसंद है।