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यह डूबती सांझ

हेमराज ठाकुर
मंडी (हिमाचल प्रदेश)
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यह डूबती सांझ देखो, ले के, घना अंधेरा आएगी,
दिनभर की आपाधापी से, हमें मुक्ति दिलाएगी।

यह बात सच है कि यह, दैनिक प्रकाश छुपाएगी,
यह भी तो सच है कि, यह अपनी गोद सुलाएगी।

मुमकिन है यह कि रात अंधेरी, हर दृश्य छुपाएगी,
पर यह भी वाजिब है कि, यह स्वप्न भी दिखाएगी।

कौन कहता है कि हर सांझ, दिवस को ही खाएगी ?
मालूम है जग को यह भी कि, फिर नई भोर आएगी।

नाउम्मीदी में जीने से तो हमेशा, निराशा ही छाएगी।
सांझ ही तो रात को ला कर, सब थकान मिटाएगी।

आशावान को तो यह सांझ, पास मंजिल-सी भाएगी,
निराशावान के लिए तो उसका, सारा संसार खाएगी॥

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