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योद्धा

डॉ. श्राबनी चक्रवर्ती
बिलासपुर (छतीसगढ़)
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दूसरी सर्जरी के बाद निरुपमा काफी कमजोर हो गई थी। वह मुश्किल से एक कमरे से दूसरे कमरे में जा सकती थी, वो भी किसी सहायता या वॉकर की मदद से। उस दिन गर्मी की दोपहर में कुछ आराम करना चाहती थी, लेकिन उसके मोबाइल पर रिंग टोन बज उठी- “कौन बोल रहा है ?” , उसने पूछा।
“आंटी, मैं रिया हूँ, आपकी पड़ोसी। कृपया दरवाज़ा खोलें।
काफी समय बाद दरवाज़ा खुला और रिया को आंटी की बिगड़ती तबीयत को देखकर वाकई दु:ख हुआ, लेकिन वह अपनी भावनाओं को उस वृद्ध महिला के सामने व्यक्त करने से बचती रही, जो पहले से ही न केवल शारीरिक रूप से, बल्कि मानसिक रूप से भी इतना दर्द झेल रही थी। उनकी कोई भी संतान अभी तक अपनी बीमार माँ को देखने नहीं आए थे, बुढ़ापे में उनकी देखभाल करना तो दूर की बात थी।
रिया नीरू आंटी के बिस्तर के सामने रखे सोफे पर बैठी थी। कॉलोनी के सब लोग निरुपमा को प्यार से नीरू आंटी कहकर बुलाते थे। रिया ने उनसे पूछा, “आंटी, अब आप कैसा महसूस कर रही हैं ?”
“पहले से काफी बेहतर नीरू।” आंटी ने कहा। आंटी के चेहरे पर एक हल्की-सी मुस्कान देखकर रिया को थोड़ी राहत महसूस हुई। रिया की खूबसूरत मुस्कान और आश्वस्त करने वाले शब्द कि “आप जल्द ही स्वस्थ हो जाएंगे” ने वृद्धा के मन में आशा की किरण बिखेर दी।
कोविड-१९ महामारी में, जब दुनिया एक बेहद चुनौतीपूर्ण स्थिति से गुजर रही है, यह नीरू आंटी की एक बहुत ही दुखद कहानी रही है जिसे रिया पिछले २-३ वर्ष से महसूस कर रही थी, हालांकि वे पिछले ८ वर्षों से पड़ोसी थे। आंटी युवावस्था में कामकाजी महिला थीं और उन्होंने कम उम्र में ही पति को खो दिया था। उनके ४ बच्चे थे जिन्हें उन्होंने अच्छी शिक्षा प्रदान थी। वे अपने पेशेवर और निजी जीवन में बहुत अच्छा कर रहे थे, समय पर सबकी शादी हो गई थी और वे सब एक अच्छा जीवन जी रहे थे, लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू यह था कि एक भी संतान अपनी बूढ़ी और बीमार माँ की देखभाल करने के लिए मौजूद नहीं थी, न केवल इस कठिन समय में, बल्कि अन्यथा भी।
नीरू आंटी के कार का ड्राइवर हरीश वैसे तो उनके लिए प्रतिदिन ४ घंटे के लिए काम पर आता था, पर उसके अलावा चौबीसों घंटे उनकी मदद करने के लिए हर वक़्त तत्पर रहता था। इस संकट के दौरान जब आंटी को अपनी पुरानी बीमारी के कारण २ बार अस्पताल में भर्ती होना पड़ा और उसके बाद २ बड़ी सर्जरी के कारण भी अस्पताल में भरती रहना पड़ा, तब इस कम पढ़े-लिखे लेकिन बहादुर दिल के व्यक्ति ने बिना किसी उम्मीद के, अपने स्वास्थ्य या अपने परिवार के सदस्यों की चिंता किए बिना दिन-रात आंटी की सेवा की।
आंटी के प्रति हरीश की भक्ति देखकर रिया और उसके पति वास्तव में चकित रह गए और उसकी वफादारी के लिए उसे मन ही मन सलाम किया। रिया ने खुद से कहा, “इस गरीब और कम पढ़े-लिखे आदमी ने दुनिया को दिखाया है कि उसने जो किया है, वह एक बेटी या बेटे से कहीं ज्यादा है, किसी लाभ या दान के लिए नहीं बल्कि अपने कर्तव्य के रूप में। रिया ने हरीश के लिए ये दुआ मांगी, “भगवान उसे आशीर्वाद दें।”
सर्जरी के एक हफ्ते बाद नीरू आंटी के टांके खुल गए और उसके बाद लगभग १० दिनों तक ड्रेसिंग जारी रही। दिन-रात रहने वाली एक नर्स की मदद से वह आहिस्ता-आहिस्ता ठीक हो रही थी, वास्तव में उम्र भी एक प्रमुख कारण था और इसी वजह से उन्हें ठीक होने में अधिक समय लग रहा था। वृद्धा अपने बच्चों की दस्तक सुनने के इंतजार में थक गई थी। हर माता-पिता की तरह उनके दिल में जो आशा थी, लेकिन व्यर्थ में ही गया उनका इंतज़ार, क्योंकि एक भी संतान इस कठिन परीक्षा के समय में भी अपनी बीमार माँ को देखने उपस्थित नहीं हुई।
रिया और तुहिन २ या ३ दिन के अंतराल पर आंटी से मिलने जाते थे, और धीरे-धीरे उनके स्वास्थ्य में सुधार देखकर खुश होते थे। वे उनकी आँखों और आवाज में दर्द महसूस कर सकते थे, जो उनके जीवन में खालीपन के कारण हुआ था। पड़ोसी का एक छोटा- सा दयाभाव भी उन्हें गहराई तक छू गया। रिया ने उनसे पूछा, “आंटी, हरीश कहाँ है?” हमने उसे पिछले २-३ दिनों से नहीं देखा है। हम उससे अक्सर मिलते थे और उससे आपका हाल-चाल जान लेते थे।”
नीरू आंटी ने कहा, “तुमको कैसे पता नहीं चला कि उसका कोरोना टेस्ट पॉजिटिव आया है और उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया है।”
“ओह माय गॉड!” यह सुनकर रिया लगभग चीख पड़ी। “बेचारा हरीश”… “भगवान उसके प्रति इतने निर्दयी क्यों हैं ?”
तुहिन ने रिया की व्यथा सुनकर कहा, “चिंता मत करो, उसके सुरक्षित और शीघ्र स्वस्थ होने की प्रार्थना करो, वह जल्द ही ठीक हो जाएगा।”
रिया ने प्रार्थना में हाथ जोड़कर अपनी आँखें बंद कर लीं और तुहिन ने रिया को “आमीन” शब्द बोलते हुए सुना।
आस-पड़ोस के लोगों को जब इसके बारे में पता चला तो उन्होंने अपने-आपको अपने घर की चार दीवारी में बंद कर लिया, दहशत और डर से जैसे कि यह विषाणु नहीं है जो उन पर हमला करने वाला है, परन्तु जैसे हरीश का भूत उनका पीछा कर रहा है। एक भी व्यक्ति उस गरीब आदमी या परिवार की मदद के लिए नहीं आया। केवल तुहिन और रिया ही उसके परिवार को कुछ आर्थिक सहायता दे पाए थे ।
एक पखवाड़े के बाद पता चला कि हरीश ‘कोरोना’ से ठीक हो गया और वह अस्पताल से विजयी होकर निकला। कुछ दिनों बाद जब वह नीरू आंटी से मिलने आया, तो वह बहुत खुश हुई क्योंकि उन्हें लगा कि उनकी सारी प्रार्थनाएँ सर्वशक्तिमान ने सुन ली हैं और उन्होंने अपनी आँखें बंद करके और हाथ जोड़कर भगवान को धन्यवाद दिया। रिया अपने दैनिक कार्यों में व्यस्त थी, तभी उसे अपने मोबाइल की बीप सुनाई द। जैसे ही वह मोबाइल के पास पहुंची तो उसने स्पष्ट रूप से देखा कि यह नीरू आंटी का फोन था। उसकी दिल की धड़कन एक पल के लिए जैसे रुक गई, लेकिन उसने हिम्मत से फोन उठाया, और वाह! उस खतरनाक विषाणु से हरीश के ठीक होने की यह अच्छी खबर थी। उसने रिया को घर आकर उस बहादुर लड़के से मिलने के लिए कहा। वह जल्दी से आंटी के घर की ओर चलने के लिए अधीर हो गई, लेकिन उससे पहले वह पूजा कक्ष में जाना नहीं भूली और हरीश की जान बचाने के लिए भगवान के सामने नतमस्तक हो गई, क्योंकि उसे कृतज्ञता की भावना महसूस हुई कि उसकी प्रार्थनाओं का उत्तर उसे मिल गया है।
१० मिनट के भीतर वह नीरू आंटी के घर पहुंच गई और हरीश को अच्छे स्वास्थ्य में देखकर बहुत खुश हुई। नीरू आंटी और उसकी आँखें आपस में मिलीं और हरीश ने उनकी आँखों से खुशी के आँसू गिरते हुए देखा। आंटी और रिया दोनों एकसाथ बोल उठे-“हरीश, तुम एक सच्चे योद्धा हो, तुमने न केवल दूसरों की जान बचाई है, बल्कि इस खतरनाक बीमारी से बचकर सुरक्षित बाहर भी आ गए हो और हर बार बहादुरी से लड़ते हुए कोरोना विषाणु के चंगुल से निकल आए। नि:स्संदेह उसके इलाज और ठीक होने के लिए चिकित्सक और चिकित्साकर्मियों की अपार मदद के बिना यह संभव नहीं होता और सभी ने उनके प्रति कृतज्ञता की एक बड़ी भावना महसूस की।

परिचय- शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय में प्राध्यापक (अंग्रेजी) के रूप में कार्यरत डॉ. श्राबनी चक्रवर्ती वर्तमान में छतीसगढ़ राज्य के बिलासपुर में निवासरत हैं। आपने प्रारंभिक शिक्षा बिलासपुर एवं माध्यमिक शिक्षा भोपाल से प्राप्त की है। भोपाल से ही स्नातक और रायपुर से स्नातकोत्तर करके गुरु घासीदास विश्वविद्यालय (बिलासपुर) से पीएच-डी. की उपाधि पाई है। अंग्रेजी साहित्य में लिखने वाले भारतीय लेखकों पर डाॅ. चक्रवर्ती ने विशेष रूप से शोध पत्र लिखे व अध्ययन किया है। २०१५ से अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय (बिलासपुर) में अनुसंधान पर्यवेक्षक के रूप में कार्यरत हैं। ४ शोधकर्ता इनके मार्गदर्शन में कार्य कर रहे हैं। करीब ३४ वर्ष से शिक्षा कार्य से जुडी डॉ. चक्रवर्ती के शोध-पत्र (अनेक विषय) एवं लेख अंतर्राष्ट्रीय-राष्ट्रीय पत्रिकाओं और पुस्तकों में प्रकाशित हुए हैं। आपकी रुचि का क्षेत्र-हिंदी, अंग्रेजी और बांग्ला में कविता लेखन, पाठ, लघु कहानी लेखन, मूल उद्धरण लिखना, कहानी सुनाना है। विविध कलाओं में पारंगत डॉ. चक्रवर्ती शैक्षणिक गतिविधियों के लिए कई संस्थाओं में सक्रिय सदस्य हैं तो सामाजिक गतिविधियों के लिए रोटरी इंटरनेशनल आदि में सक्रिय सदस्य हैं।

 

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