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वक्त की पहचान

सच्चिदानंद किरण
भागलपुर (बिहार)
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वक्त ने वक्त से व़ाकिफ,
करा व्यक्तित्व संग जीवन
व्यवस्थित कर,
व्यक्ति पौरूषत्व में समदर्शी बन वक्त से
नेह जोड़,
जीना सिखा दिया।

राहें जटिल हो सच्चाई,
के और अपना हो
पराए-सा तो,
आपका सुवक्त ही
साथ होगा दुर्दिन वक्त,
वक्त कभी रूकता नहीं
पल‌ भर‌ भी,
चाहे ब्रह्मांड की भूमंडलीय
गति परिवर्तन क्यों
न हो जाए।

वक्त तो शून्य में भी,
गतिशील है और
अनंत क्षितिज की दूरदृष्टि में भी
वक्त कभी बुरा नहीं होता,
बुरा होता दुर्व्यवहार
मनोमन‌ के आचरण भेदता,
अंलकृत वक्त तो
एक अदृश्य आकृति में,
दिखावा है जीवन के साथ।

यदि सुवक्त स्वयं में,
स्थायित्व को न समझ पाना
वक्त की परीक्षा में,
वो वक्त कभी विफल ही नहीं होता
जिसका अपना ही,
वक्त ना हो सफल परिकल्पना से।

वक्त धोखा नहीं!
वक्त तो संदेश वाहक हो,
समर्पित रहता सबके
यथेष्ठ सुव्यवस्थित कार्यों से,
वक्त धैर्यवान है
सामर्थ्यवान है हर कुवक्त पर,
केवल पहचान हो
धीर-वीर सामयिक व्यवस्था के,
सटीक पैमाने पर।
वक्त तो जीवंत है,
चिंता से चिता तक की
अनवरत उम्मीद की,
सलाखों से गुजरते हुए॥

परिचय- सच्चिदानंद साह का साहित्यिक नाम ‘सच्चिदानंद किरण’ है। जन्म ६ फरवरी १९५९ को ग्राम-पैन (भागलपुर) में हुआ है। बिहार वासी श्री साह ने इंटरमीडिएट की शिक्षा प्राप्त की है। आपके साहित्यिक खाते में प्रकाशित पुस्तकों में ‘पंछी आकाश के’, ‘रवि की छवि’ व ‘चंद्रमुखी’ (कविता संग्रह) है। सम्मान में रेलवे मालदा मंडल से राजभाषा से २ सम्मान, विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ (२०१८) से ‘कवि शिरोमणि’, २०१९ में विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ प्रादेशिक शाखा मुंबई से ‘साहित्य रत्न’, २०२० में अंतर्राष्ट्रीय तथागत सृजन सम्मान सहित हिंदी भाषा साहित्य परिषद खगड़िया कैलाश झा किंकर स्मृति सम्मान, तुलसी साहित्य अकादमी (भोपाल) से तुलसी सम्मान, २०२१ में गोरक्ष शक्तिधाम सेवार्थ फाउंडेशन (उज्जैन) से ‘काव्य भूषण’ आदि सम्मान मिले हैं। उपलब्धि देखें तो चित्रकारी करते हैं। आप विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ केंद्रीय कार्यकारिणी समिति के सदस्य होने के साथ ही तुलसी साहित्य अकादमी के जिलाध्यक्ष एवं कई साहित्यिक मंच से सक्रियता से जुड़े हुए हैं।

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