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वेलु नचियार:अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल फूंकने वाली पहली रानी

राधा गोयल
नई दिल्ली
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भारत की एक रानी, जिसकी कहानी

बहुत कम लोगों ने सुनी है। हम आज़ादी के ७५ वें वर्ष के करीब हैं। यह आजादी बड़ी कीमती है…अनेक देशभक्तों के त्याग और तपस्या का परिणाम है। हम उनके प्रति सदैव ऋणी रहेंगे, लेकिन हमारे स्वाधीनता संग्राम में ऐसे कई वीर-वीरांगनाएँ हुई हैं, जिनके बलिदान को इतिहास में भुला दिया गया, उन्हें शायद ही कभी याद किया जाता है।
गुमनामी में खो गई इन वीर आत्माओं के साहस और त्याग बारे में हर भारतीय को जानना चाहिए… इनकी कहानियाँ शालाओं में पढ़ाई जानी चाहिए।
ऐसी ही एक वीरांगना रानी ‘वेलु नचियार’ है, जिसने स्वाधीनता आंदोलन की पहली रानी बनकर अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध का बिगुल फूँका।
एक योद्धा रानी ने ५ हजार की सेना के साथ मिलकर अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे। यह एक ऐतिहासिक घटना थी, जिसमें भारत की न केवल पहली महिला योद्धा का उदय हुआ था, बल्कि देश में आत्मघाती बम विस्फोट की पहली घटना भी हुई थी।
१८वीं शताब्दी के दौरान वर्तमान तमिलनाडु में शिव गंगई रियासत में वेलु नचियार नाम की एक रानी थी। वेलु, सेतुपति राजवंश के शाही दंपति की इकलौती पुत्री थी और वे राज्य के उत्तराधिकारी के रूप में पली बढ़ी थीं। यह युद्ध कलाओं, घुड़सवारी और तीरंदाजी में प्रशिक्षित फ़्रांसीसी, उर्दू और अंग्रेजी सहित कई भाषाओं में भी निपुण थीं। रानी वेलु शिवगंगा की रानी थी, लेकिन १७७२ में रानी के जीवन में दुखद मोड़ तब आया, जब अर्कोट के नबाव और ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सेनाएँ दुर्भाग्य बन कर आईं तथा रानी से पति और शिवगंगा का किला दोनों छीन लिए। कलैयार कोईल युद्ध में पति मुथु वडुगनाथ पेलियार की हत्या कर दी गई। तब वेलु और पुत्री वेल्लाची को किले से भागने के लिए मजबूर होना पड़ा।
दुधमुँही बच्ची को बाँहों में छिपाए रानी जंगल में निकल गई। वीर मरूदु भाइयों और वीरांगना उदियाल ने उनकी रक्षा की। दुर्भाग्यवश उदियाल पकड़ी गयी और मार दी गई। रानी वेलु ने कसम खाई कि वे पति और उदियाल की मौत का बदला लेकर रहेगी, साथ ही मातृभूमि को पुनः आजाद कराके रहेगी।
रानी वेलु शिवगंगई से दूर डिंडीगुल पहुँचीं। डिंडीगुल में ही उनकी मुलाकात हैदर:अली से भी हुई, जिनसे सहानुभूति मिली। हैदर अली उनकी धाराप्रवाह उर्दू और बुद्धिमत्ता से प्रभावित हो गए थे। १७८० में गोपाल नायकर के अटूट समर्थन और हैदर अली की सहयोगी सेनाओं के साथ वेलु नचियार अपने पति की मौत का बदला लेने और अपने राज्य पर पुनः नियंत्रण प्राप्त करने के लिए निकल पड़ीं। वेलु ने अपनी सेनाध्यक्ष कुयिली के साथ आत्मघाती हमले की योजना बनाई। योजना की सफलता के लिए कुयिली नाम की बहादुर कमाण्डर ने किले में प्रवेश करने की अपनी योजना रानी को बताई। युक्ति के अनुसार ‘उदियाल सेना’ की वीर कमांडर कुयिली चुनिंदा महिला सैनिकों के साथ ग्रामीण महिलाओं के वेश में किले में प्रवेश कर गई। भीतर मौका पाते ही अंग्रेजों पर धावा बोल दिया। हतप्रभ अंग्रेज संभल पाते कि इन वीरांगनाओं ने द्वार रक्षकों को मारकर किले का दरवाजा खोल दिया और रानी वेलु अपनी सेना के साथ प्रलय बनकर शत्रु पर टूट पड़ीं। उनकी तलवारें बिजली बनकर शत्रु पर गिरने लगीं।
इसी दौरान वीर कुयिली ने मंदिर में पूजा हेतु रखे घी को अपने शरीर पर उड़ेल लिया और खुद को आग लगा ली…। फिर आग बरसाती कुयिली तलवार से सिपाहियों को काटती हुई अंग्रेजों के गोला-बारूद भंडार में घुस गई। उसे जलाकर नष्ट कर दिया। मातृभूमि की रक्षा में इस तरह का आत्मबलिदान देने की संभवत: यह पहली घटना थी।
आखिर अंग्रेजों ने घुटने टेक दिए। वेलु की प्यारी शिवगंगा दासता की बेड़ियों से मुक्त हो चुकी थी।
रानी वेलु भारत की पहली रानी थीं, जिन्होंने १८५७ के स्वाधीनता संग्राम से बहुत पहले ही अंग्रेजों का अभिमान मिट्टी में मिलाकर अपना राज्य वापस हासिल किया था, और फिर राज भी किया। वो भारत की पहली ‘झांसी की रानी’ थीं।
ऐसे लोगों के बारे में पाठ्य पुस्तकों में वर्णन होना चाहिए, ताकि ऐसे महान क्रान्तिकारी गुमनामी के अंधेरों से बाहर आ सकें और आज की पीढ़ी उनके बारे में यह जान सके कि, ये आजादी बहुत कुर्बानियाँ देकर मिली है।