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शरणागत वत्सल्ता

राधा गोयल
नई दिल्ली
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एक दिन शिवि की सभा में बाज कबूतर लड़ते आए
हाय कबूतर शिवि की गोद में कैसे छिप-छिप जाए।

“त्राहिमाम हे राजन, मुझको बाज आ रहा खाने।
इसीलिए मैं यहाँ आ छुपा तुमसे रक्षा पाने।”

ज्यों ही शिवि ने कहा, “मैं तुमको अभयदान देता हूँ।
बाज नहीं खा सकता तुमको, मैं यह प्रण लेता हूँ।”

त्यों ही आकर कहा बाज ने, ” दो मेरा आहार,
न्यायप्रिय नृप न्याय करो, तुम न्यायमूर्ति साकार।”

“अरे बाज क्या नहीं जानते हो तुम लोकाचार ?
शरणागत द्रोह से बढ़कर क्या होता अत्याचार ?”

“न्यायप्रिय नृप! नहीं जानते क्या तुम न्यायाचार ?
एक जीव की रक्षा से, नृप जीव मरेंगे चार।”

“अभयदान दे दिया जिसे, शत्रु को कैसे दे दूँ ?
गिरें नर्क में सात पीढ़ियाँ, यह पातक कैसे लूँ ?

“मैं ही तुम्हें कुप्यारा, और कबूतर प्यारा हाय!
न्यायी कहलाने वाले, क्या यही आपका न्याय ?

आज सुबह से पीछा करते बीत गई दोपहरी,
फिर भी मिला न भक्ष्य मेरा, हाय कैसी किस्मत मेरी।”

“हीरा, मोती, माणिक ले लो, दुखित न होओ बाज।
यदि तुमको राज्याकांक्षा हो, भोगो मेरा राज।”

“नहीं लालसा मुझे राज्य की, मुझे चाहिए माँस।
मेरे भूखे प्राणों को तो, सिर्फ माँस की आस।”

“जितना चाहो माँस, दिला सकता हूँ तुमको बाज,”
“निर्जीवों का माँस, मैं नहीं खाता हूँ महाराज।”

“निर्जीवों का माँस अगर तुम नहीं खाते हो बाज,
तुम्हें सजीवों का ही माँस दिलाऊँगा मैं आज।”

“यही कबूतर दे दो मुझको, हठ न करो महाराज,
किसी और की हत्या क्यों तुम करते हो सम्राट ?”

“किसी अन्य की हत्या नहीं करूँगा पक्षीराज,
आज धर्म की वेदी पर दूँगा निज प्राण निसार।”

“तुच्छ कबूतर की खातिर , क्यों हठ करते नृपराज ?
प्राण आपके मूल्यवान हैं धर्मव्रती सम्राट।”

“आज धर्म की रक्षा हित दूँगा निज प्राण निसार,
अजर-अमर हूँ नहीं, मुझे मरना है कल या आज।”

इतना कहकर राजा शिवि ने एक तुला मँगवाई।
हा! हा! कैसा दारूण दृश्य देता है दिखलाई।

एक तरफ रख रहे काट, उशीनरपति अपना माँस,
एक तरफ है रखा कबूतर, लेता गिन-गिन साँस।

हल्का होता बहुत कबूतर, किंतु हुआ क्या आज ?
पलड़ा ऊँचा होता जाता, जितना रखते माँस।

पहले काटा एक पाँव, फिर काटा दूजा पाँव,
पलड़ा भारी हुआ न फिर भी, काट दिया एक हाथ।

पलड़ा नीचा हुआ न, तब खुद बैठ गए नृपराज।
पुष्पवृष्टि हो उठी गगन से, और बज उठे साज।

अरे! अचानक हुआ यह क्या, चौंक उठे महाराज।
बिजली कौंधी, प्रकट हो गए अग्नि और सुरराज।

“सफल हुए तुम आज, तुम्हें है धन्य-धन्य नृपराज।
देंगे, जो वर चाहो”, बोले अग्नि और सुरराज।

हाथ फिराया शिवि की देह पर, कटे अंग सब ठीक हो गए,
शरणागत रक्षा करने से, नृप शिवि जग में अमर हो गए॥

(विशेष:यह कहानी बड़ी उम्र के सभी लोगों ने पढ़ी होगी जिसे यहाँ काव्यरूप दिया गया है।)