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शाप देने का सुख

अरुण अर्णव खरे 
भोपाल (मध्यप्रदेश)
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पुरातन इतिहास में निर्मल हृदय,सच्चरित्र और गुणवान व्यक्तियों द्वारा अनैतिक और धर्मविरुद्ध कार्य करने वालों को शाप दिए जाने के अनेक उदाहरण मिलते हैं,पर कलियुग में शाप–लोगों ने पहली बार सुना। जिस कलियुग में चरित्र और हृदय की पावनता का पूरी तरह से टोटा हो,उस युग में शाप दिया गया,इसलिए सब चौंक गए। पहले के तीन युगों-सतयुग,त्रेता और द्वापर में इतने शाप दिए गए कि,उनकी गणना कर पाना तक मुमकिन नहीं है। हाँ भाई,आज भी मुमकिन नहीं है,जबकि आज वो भी हैं जिनके कारण वो हैं तो मुमकिन है जैसा राग देश के कोने-कोने में सुनाई दे रहा है। पण्डित त्रिभुवन नाथ कसाई मण्डी वालों ने भी शाप के बारे में सुना था,लेकिन वह बिल्कुल नहीं चौंके। उन्हें पुराने जमाने की विभिन्न शापों के बारे में अच्छा-खासा ज्ञान था। समय-समय पर दिए गए शापों के बारे में उनका अध्ययन भी वृहत किस्म का था। उनके परम मित्र मुरारी जी,जो उसी दिन से परेशान घूम रहे थे,शंका निवारण के लिए उनकी गद्दी पर आ धमके। आते ही बोले-“पण्डित जी,क्या कोई कलियुग में शाप दे सकता है ?” पण्डित जी ने उनकी बात को अनसुना किया और उल्टा प्रश्न मुरारी जी की ओर उछाल दिया-“तुम शाप के बारे में क्या जानते हो ?” मुरारी जी जानते थे आजकल प्रश्नों के उत्तर देने की परम्परा नहीं रही। प्रश्नकर्ता को ही उत्तर देना होता है,अतएव उनको पण्डित जी के प्रतिप्रश्न का बुरा नहीं लगा। उन्होंने शान्तिपूर्वक उत्तर दिया-“गुरुवर,मैंने बहुत से शापों के बारे में सुन रखा है। मुझे पता है राजा दशरथ को श्रवण कुमार के माता-पिता ने शाप दिया था कि जिस तरह हम पुत्र-वियोग में मृत्यु को प्राप्त हो रहे हैं,उसी तरह आपकी मृत्यु भी पुत्र-वियोग में होगी। राजा के हाथों अनजाने में ही श्रवण कुमार की हत्या हो गई थी और बाद में उन्हें राम के वियोग में अपने प्राण गँवाना पड़े थे। महाभारत युद्ध की समाप्ति पर गांधारी ने कृष्ण को अपने सौ पुत्रों की मृत्यु का जिम्मेदार मानते हुए कुल के नाश होने का शाप दिया था।” “बहुत अच्छे..काफी जानकारी रखते हो”-पण्डित जी ने मुरारी जी की पीठ ठोंकी,पर मुरारी जी संज्ञान न लेते हुए पूर्ण बेशर्मी से बोले -“अब मेरे प्रश्न का उत्तर!”

“हाँ,कलियुग में भी शाप दे सकते हैं…मैंने भी एक बार शाप दिया है।”

“आपने!”-मुरारी जी इस तरह चौंके,जैसे पनियल साँप उनको देखकर कोबरे की तरह फुफकारा हो।

“हाँ,मैंने..बात ज्यादा पुरानी नहीं है। उस समय मैंने किंगफिशर एयरलाइंस से अहमदाबाद का टिकट बुक कराया था,लेकिन फ्लाइट निरस्त हो गई। मुझे टिकट का पैसा वापस पाने के लिए बहुत भाग-दौड़ करनी पड़ी थीl परेशान होकर मैंने विजय माल्या को शाप दे दिया कि,जा तुझे सब भगौड़ा कहेंगे…और कुछ समय बाद ही वह भगौड़ा घोषित हो गया। “पण्डित जी रुके और विजयी भाव से मुरारी जी को देखने लगेl मुरारी जी भी विष्फारित नेत्रों से उनको देख रहे थे।

“पर आपने बताया नहीं कभी-किसी को आपके इस शाप के बारे में जानकारी नहीं हैl”

“भाई सावधानी बरतनी पड़ती है..अब दुर्वासा की तरह कमण्डल से अंजुरी में जल भरकर शाप देने के दिन लद गए हैं…इतना तो तुम जानते ही हो,परिणाम का पहले से पता होना जरूरी है,तभी शाप असरकारी दिखाई देता है..वरना भद्द पिटने की पूरी सम्भावना है..इस युग में शाप देने का यह सबसे सुरक्षित तरीका है।”

गुरुदेव आपकी जय हो,मुरारी जी उनके पैर थामकर कहना चाहते थे पर संकोचवश कह नहीं सके। वह वापस लौटते हुए सोच रहे थे …चुनाव के बाद वह भी प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपने शाप के बारे में सबको बताएँगे कि फलाँ नेता उनके शाप के कारण ही प्रधानमंत्री नहीं बन सका।अब वह भी शाप देने का सुख फील कर सकेंगे।

परिचय:अरुण अर्णव खरे का जन्म २४ मई १९५६ को अजयगढ़,पन्ना (म.प्र.) में हुआ है। होशंगाबाद रोड (म.प्र.), भोपाल में आपका घरौंदा है। आपने भोपाल विश्वविद्यालय से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक की शिक्षा प्राप्त की है। आप लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग में मुख्य अभियंता पद से सेवानिवृत हैं। कहानी और व्यंग्य लेखन के साथ कविता में भी रुचि है। कहानियों और व्यंग्य आलेखों का नियमित रूप से देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं सहित विभिन्न वेब पत्रिकाओं में भी प्रकाशन जारी है। श्री खरे का १ व्यंग्य संग्रह और १ कहानी संग्रह सहित २ काव्य कृतियाँ-“मेरा चाँद और गुनगुनी धूप” तथा “रात अभी स्याह नहीं” प्रकाशित है। कुछ सांझा संकलनों में भी कहानियों तथा व्यंग्य आलेखों का प्रकाशन हुआ है। कहानी संग्रह-“भास्कर राव इंजीनियर” व व्यंग्य संग्रह-“हैश,टैग और मैं” प्रकाशित है। कहानी स्पर्धा में आपकी कहानी ‘मकान’ पुरस्कृत हो चुकी है। गुफ़्तगू सम्मान सहित दस-बारह सम्मान आपके खाते में हैं। इसके अलावा खेलों पर भी ६ पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। भारतीय खेलों पर एक वेबसाइट का संपादन आपके दायित्व में है। आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर भी वार्ताओं का प्रसारण हुआ है। आप मध्यप्रदेश में कुछ प्रमुख पत्रिकाओं से भी जुड़े हुए हैं। अमेरिका में भी काव्यपाठ कर चुके हैं।