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सँभलना है अगर

कैलाश झा ‘किंकर’
खगड़िया (बिहार)
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विश्व धरा दिवस स्पर्धा विशेष……………

अब दरख़्तों के लिए सोचें सँभलना है अगर,
पेड़ की रक्षा करें खुशहाल रहना है अगर।

आम,पीपल,नीम,तुलसी,बेल,बरगद के लिए
हों सजग सारा ज़माना दूर चलना है अगर।

पेड़-पौधों पर टिकी है ज़िन्दगी संसार की,
काटिये इनको नहीं आबाद रहना है अगर।

साग-सब्जी,फूल,फसलों के बिना जीवन कहाँ,
जानवर भी पालिये खिलना-विहँसना है अगर।

हर प्रदूषण के लिए तो स्वार्थ जिम्मेदार है,
सोचिए सबके लिए किंकर उबरना है अगर।

परिचय-कैलाश झा का साहित्यिक उपनाम-किंकर है। जन्म १२ जनवरी १९६२ को पर्रा बेगूसराय(बिहार) में हुआ है। पैतृक गाँव-हरिपुर(खगड़िया) निवासी श्री झा वर्तमान में जिला खगड़िया(बिहार)में बसे हुए हैं। भाषा ज्ञान-हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,अंगिका, मैथिली का है। आपकी शिक्षा-एम.ए. तथा एल.एल.बी. है। कार्यक्षेत्र-प्रधानाध्यापक (खगड़िया)का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप खगड़िया में साहित्यिक संस्था के संयोजक और मंच के महासचिव हैं। साथ ही एक पत्रिका के सम्पादक भी हैं। इनकी लेखन विधा-गीत,ग़जल,लेख ,आलेख,कथा,लघुकथा,संस्मरण,समीक्षा एवं डायरी आदि है। प्रकाशित पुस्तकों में-‘हिन्दी कविता संग्रह-संदेश, दरकती जमीन,चलो पाठशाला,तीनों भुवन की स्वामिनी,कोई-कोई औरत और ईमान बचाए रखते हैं’ के अलावा  अंगिका संग्रह-‘जत्ते चलै चलैने जा,ओकरा कोय सनकैने छै,जानै जौ कि जानै जाता’ सहित ग़ज़ल संग्रह-‘हम नदी की धार में, देखकर हैरान हैं सब और मुझको अपना बना के लूटेगा’ आदि हैं। शताधिक पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित हैं। आकाशवाणी भागलपुर और दूरदर्शन पटना से रचनाएँ प्रसारित और कई भाषाओं में अनुवादित भी हैं। प्राप्त सम्मान-पुरस्कार में आपको बिहार,उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश एवं दिल्ली आदि की साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया है। किंकर की विशेष उपलब्धि-मंत्रिमंडल सचिवालय (हिन्दी विभाग)बिहार सरकार द्वारा ग़ज़ल संग्रह-‘देखकर हैरान हैं सब’ को पांडुलिपि प्रकाशन अनुदान मिलना है। लेखनी का उद्देश्य-‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के भाव से भारतीय छंदों के प्रचार-प्रसार हेतु लेखन,प्रकाशन और आयोजन है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-रामधारी सिंह ‘दिनकर’,महादेवी वर्मा, शिवपूजन सहाय,जानकी वल्लभ शास्त्री,सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, फणीश्वरनाथ रेणु और प्रेमचंद हैं। प्रेरणापुंज-पूनम कुमारी है। विशेषज्ञता -हँसी-मजाक पसंद होने से हास्य-व्यंग्य की ओर शुरू से झुकाव है। देश और हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार-
‘स्वाधीनता की रोशनी को गाँव-घर तक ले चलें,
गुमनामियों में जी रहे अहले-हुनर तक ले चलें।
जब काव्य-पुष्प खिल जाएगा,
सबको जवाब मिल जाएगा।’