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संवत्सर पड़वा के प्रणेता जैन सम्राट विक्रमादित्य

डॉ.अरविन्द जैन
भोपाल(मध्यप्रदेश)
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इतिहास हमेशा विवाद का विषय रहा है,और उससे हमेशा विवाद का रौद्र रूप हो जाता हैl वो तो धन्य हैं इतिहासकार और विद्वान् जिन्होंने अपनी खोज से बहुत सीमा तक अनेक विवादों को निर्विवाद कर दिया,अन्यथा संकीर्ण मानसिकता के कारण विरोध का होना स्वाभाविक होता हैl ऐसे कई उदाहरण इतिहास के मिल जाते हैंl
ऐतिहासिक राजकीय भारतीय संवत् के सर्वप्रथम प्रवर्तक राजा विक्रमादित्य थे। आप अनेक भारतीय लोककथाओं के नायक हैं। अयोध्या के राजा राम के बाद उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने इस देश की परम्परा में जैसा गहरा स्थान बनाया है,वैसा दूसरा कोई राजा कभी नहीं बना सका। राजा विक्रमादित्य तीव्र बुद्धिमान,पराक्रमी,उदार, दानशील,धर्मसहिष्णु,विद्यारसिक,विद्वानों के प्रश्रयदाता,न्यायपरायण, धर्मात्मा,प्रजावत्सल एवं सुशासक के रूप में आदर्श भारतीय नरेश माने जाते हैं।
पूर्ववर्ती चन्द्रगुप्त मौर्य एवं खारवेल जैसे महान् जैन सम्राटों की परम्परा में देश को विदेशियों के आक्रमण से मुक्त करने में यह महान् जैन सम्राट विक्रमादित्य भी अविस्मरणीय हैं। जैन अनुश्रुतियों के अनुसार वह जैनधर्म का परमभक्त था। कुलधर्म और राजधर्म भी जैनधर्म था। विक्रमादित्य ने चिरकाल तक राज्य किया और स्वदेश को सुखी, समृद्ध एवं नैतिक बनाया। विक्रमादित्य तथा उसके उपरान्त उसके वंशजों ने मालवा पर लगभग १०० वर्ष राज्य किया था। विक्रमादित्य जैसे राजा के आदर्शों का स्मरण हम लोग चैत्र शुक्ल पक्ष के प्रथम दिन यानि युग प्रतिपदा को राष्ट्रीय नव वर्ष दिवस के रूप में मना कर करते हैं।
विक्रमादित्य उज्जैन के अनुश्रुत राजा थे,जो अपने ज्ञान,वीरता और उदारशीलता के लिए प्रसिद्ध थे। विक्रमादित्य की उपाधि भारतीय इतिहास में बाद के कई अन्य राजाओं ने प्राप्त की थीl राजा विक्रमादित्य नाम,’विक्रम’ और ‘आदित्य’ के समास से बना है,जिसका अर्थ ‘पराक्रम का सूर्य’ या ‘सूर्य के समान पराक्रमी’ है। उन्हें विक्रम या विक्रमार्क (विक्रम + अर्क) भी कहा जाता है (संस्कृत में अर्क का अर्थ सूर्य है)। भविष्य पुराण व आईने अकबरी के अनुसार विक्रमादित्य पंवार (प्रमार) वंश के सम्राट थे,जिनकी राजधानी उज्जयिनी थी।
हिन्दू शिशुओं में ‘विक्रम’ नामकरण के बढ़ते प्रचलन का श्रेय आंशिक रूप से विक्रमादित्य की लोकप्रियता और उनके जीवन के बारे में लोकप्रिय लोक कथा अनुश्रुत विक्रमादित्य,संस्कृत और भारत के क्षेत्रीय भाषाओं,दोनों में एक लोकप्रिय व्यक्तित्व है। उनका नाम बड़ी आसानी से ऐसी किसी घटना या स्मारक के साथ जोड़ दिया जाता है,जिनके ऐतिहासिक विवरण अज्ञात होंl हालांकि,उनके इर्द-गिर्द कहानियों का पूरा चक्र फला-फूला है। संस्कृत की सर्वाधिक लोकप्रिय दो कथा-श्रृंखलाएं हैं वेताल पंचविंशति या बेताल पच्चीसी (पिशाच की २५ कहानियां) और सिंहासन-द्वात्रिंशिका (सिंहासन की ३२ कहानियां,जो सिहांसन बत्तीसी के नाम से भी विख्यात हैं)। इन दोनों के संस्कृत और क्षेत्रीय भाषाओं में कई रूपांतरण मिलते हैं।
पिशाच (बेताल) की कहानियों में बेताल,पच्चीस कहानियां सुनाता है,जिसमें राजा बेताल को बंदी बनाना चाहता है और वह राजा को उलझन पैदा करने वाली कहानियां सुनाता हैl उनका अंत राजा के समक्ष एक प्रश्न रखते हुए करता है। इन कहानियों का एक रूपांतरण कथा-सरित्सागर में देखा जा सकता है।
सिंहासन के क़िस्से,विक्रमादित्य के उस सिंहासन से जुड़े हुए हैं जो खो गया था और कई सदियों बाद धार के परमार राजा भोज द्वारा बरामद किया गया था। स्वयं राजा भोज भी काफ़ी प्रसिद्ध थे और कहानियों की यह श्रृंखला उनके सिंहासन पर बैठने के प्रयासों के बारे में है। अंत में पुतलियां उनकी विनम्रता से प्रसन्न होकर उन्हें सिंहासन पर बैठने देती हैं।
शनि से संबंधित विक्रमादित्य की कहानी को अक्सर कर्नाटक राज्य के यक्षगान में प्रस्तुत किया जाता है। कहानी के अनुसार-विक्रम नवरात्रि का पर्व बड़े धूम-धाम से मना रहे थे और प्रतिदिन एक ग्रह पर वाद-विवाद चल रहा था। अंतिम दिन की बहस शनि के बारे में थी। ब्राह्मण ने शनि की शक्तियों सहित उनकी महानता और पृथ्वी पर धर्म को बनाए रखने में उनकी भूमिका की व्याख्या की। समारोह में ब्राह्मण ने ये भी कहा कि विक्रम की जन्म कुंडली के अनुसार उनके बारहवें घर में शनि का प्रवेश है,जिसे सबसे खराब माना जाता है,लेकिन विक्रम संतुष्ट नहीं थे; उन्होंने शनि को महज लोककंटक के रूप में देखा,जिन्होंने उनके पिता (सूर्य),गुरु (बृहस्पति) को कष्ट दिया था। इसलिए विक्रम ने कहा कि वे शनि को पूजा के योग्य मानने के लिए तैयार नहीं हैं। विक्रम को अपनी शक्तियों पर,विशेष रूप से अपने देवी माँ का कृपापात्र होने पर बहुत गर्व था। जब उन्होंने नवरात्रि समारोह की सभा के सामने शनि की पूजा को अस्वीकृत कर दिया,तो शनि भगवान क्रोधित हो गए। उन्होंने विक्रम को चुनौती दी कि वे विक्रम को अपनी पूजा करने के लिए बाध्य कर देंगे। जैसे ही शनि आकाश में अंतर्धान हो गएl विक्रम ने कहा कि यह उनकी खुशकिस्मती है और किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए उनके पास सबका आशीर्वाद है। विक्रम ने निष्कर्ष निकाला कि संभवतः ब्राह्मण ने उनकी कुंडली के बारे में जो बताया था वह सच हो;लेकिन वे शनि की महानता को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। विक्रम ने निश्चयपूर्वक कहा कि “जो कुछ होना है, वह होकर रहेगा और जो कुछ नहीं होना है, वह नहीं होगा” और उन्होंने कहा कि वे शनि की चुनौती को स्वीकार करते हैं।
एक दिन एक घोड़े बेचने वाला उनके महल में आया और कहा कि विक्रम के राज्य में उसका घोड़ा खरीदने वाला कोई नहीं है। घोड़े में अद्भुत विशेषताएं थीं-जो एक छलांग में आसमान पर,तो दूसरे में धरती पर पहुंचता था। इस प्रकार कोई भी धरती पर उड़ या सवारी कर सकता है। विक्रम को उस पर विश्वास नहीं हुआ,इसीलिए उन्होंने कहा कि घोड़े की क़ीमत चुकाने से पहले वे सवारी करके देखेंगेl विक्रेता इसके लिए मान गया और विक्रम घोड़े पर बैठे और घोड़े को दौडायाl विक्रेता के कहे अनुसार,घोड़ा उन्हें आसमान में ले गया। दूसरी छलांग में घोड़े को धरती पर आना चाहिए था,लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। इसके बजाय उसने विक्रम को कुछ दूर चलाया और जंगल में फेंक दिया। विक्रम घायल हो गए और वापसी का रास्ता ढूंढ़ने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि यह सब उनका नसीब है,इसके अलावा और कुछ नहीं हो सकता;वे घोड़े के विक्रेता के रूप में शनि को पहचानने में असफल रहे।
किसी तरह धीरे-धीरे विक्रम एक नगर पहुंचे और भूखे ही एक पेड़ के नीचे बैठ गए। जिस पेड़ के नीचे विक्रम बैठे हुए थे,ठीक उसके सामने एक कंजूस दुकानदार की दुकान थी। जिस दिन से विक्रम उस पेड़ के नीचे बैठे,उस दिन से दुकान में बिक्री बहुत बढ़ गई। लालच में दुकानदार ने सोचा कि दुकान के बाहर इस व्यक्ति के होने से इतने अधिक पैसों की कमाई होती है और उसने विक्रम को घर पर आमंत्रित करने और भोजन देने का निर्णय लिया। बिक्री में लंबे समय तक वृद्धि की आशा में, उसने अपनी पुत्री को विक्रम के साथ शादी करने के लिए कहाl भोजन के बाद जब विक्रम कमरे में सो रहे थे,तब पुत्री ने कमरे में प्रवेश किया। वह बिस्तर के पास विक्रम के जागने की प्रतीक्षा करने लगी। धीरे-धीरे उसे भी नींद आने लगी। उसने अपने गहने उतार दिए और उन्हें एक बत्तख के चित्र के साथ लगी कील पर लटका दिया। वह सो गई। जागने पर विक्रम ने देखा कि चित्र का बत्तख उसके गहने निगल रहा है। जब वे अपने द्वारा देखे गए दृश्य को याद कर ही रहे थे कि दुकानदार की पुत्री जग गई और देखती है कि उसके गहने गायब हैं। उसने अपने पिता को बुलाया और कहा कि वह चोर है।
विक्रम को वहां के राजा के पास ले जाया गया। राजा ने निर्णय लिया कि विक्रम के हाथ और पैर काट कर उन्हें रेगिस्तान में छोड़ दिया जाए. जब विक्रम रेगिस्तान में चलने में असमर्थ और ख़ून से लथपथ हो गए,तभी उज्जैन में अपने मायके से ससुराल लौट रही एक महिला ने उन्हें देखा और पहचान लिया। उसने उनकी हालत के बारे में पूछताछ की और बताया कि उज्जैनवासी उनकी घुड़सवारी के बाद गायब हो जाने से काफी चिंतित हैं। वह अपने ससुराल वालों से उन्हें अपने घर में जगह देने का अनुरोध करती है और वे उन्हें अपने घर में रख लेते हैं। उसके परिवार वाले श्रमिक वर्ग के थे;विक्रम उनसे कुछ काम मांगते हैं। वे कहते हैं कि वे खेतों में निगरानी करेंगे और हांक लगाएंगे ताकि बैल अनाज को अलग करते हुए चक्कर लगाएंl
एक शाम जब विक्रम काम कर रहे थे,हवा से मोमबत्ती बुझ जाती है। वे दीपक राग गाते हैं और मोमबत्ती जलाते हैं। इससे सारे नगर की मोमबत्तियां जल उठती हैं-नगर की राजकुमारी ने प्रतिज्ञा कि थी कि वे ऐसे व्यक्ति से विवाह करेंगी जो दीपक राग गाकर मोमबत्ती जला सकेगा। वह संगीत के स्रोत के रूप में उस विकलांग आदमी को देख कर चकित हो जाती है,लेकिन फिर भी उसी से शादी करने का फैसला करती है। राजा जब विक्रम को देखते हैं तो याद करके आग-बबूला हो जाते हैं कि पहले उन पर चोरी का आरोप था और अब वह उनकी बेटी से विवाह के प्रयास में है। वे विक्रम का सिर काटने के लिए अपनी तलवार निकाल लेते हैं। उस समय विक्रम अनुभव करते हैं कि उनके साथ यह सब शनि की शक्तियों के कारण हो रहा है। अपनी मौत से पहले वे शनि से प्रार्थना करते हैं। वे अपनी ग़लतियों को स्वीकार करते हैं और सहमति जताते हैं कि उनमें अपनी हैसियत की वजह से काफ़ी घमंड था। शनि प्रकट होते हैं और उन्हें उनके गहने,हाथ,पैर और सब-कुछ वापस लौटाते हैं। विक्रम शनि से अनुरोध करते हैं कि जैसी पीड़ा उन्होंने सही है,वैसी पीड़ा सामान्यजन को ना दें। वे कहते हैं कि उन जैसा मजबूत इन्सान भले ही पीड़ा सह ले,पर सामान्य लोग सहन करने में सक्षम नहीं होंगे। शनि उनकी बात से सहमत होते हुए कहते हैं कि वे ऐसा कतई नहीं करेंगे। राजा अपने सम्राट को पहचान कर उनके समक्ष समर्पण करते हैं और अपनी पुत्री की शादी उनसे कराने के लिए सहमत हो जाते हैं। उसी समय,दुकानदार दौड़ कर महल पहुंचता है और कहता है कि बतख ने अपने मुँह से गहने वापस उगल दिए हैं। वह भी राजा को अपनी बेटी सौंपता है। विक्रम उज्जैन लौट आते हैं और शनि के आशीर्वाद से महान सम्राट के रूप में जीवन व्यतीत करते हैंl
भारतीय परम्परा के अनुसार धन्वन्तरि,क्षपनक,अमरसिंह, शंकु,खटकरपारा,कालिदास,वेतालभट्ट (या बेतालभट्ट),वररुचि और वराहमिहिर उज्जैन में विक्रमादित्य के राज दरबार का अंग थे। कहते हैं कि राजा के पास नवरत्न कहलाने वाले नौ ऐसे विद्वान थे।
मध्यप्रदेश में स्थित उज्जैन-महानगर के महाकाल मन्दिर के पास विक्रमादित्य टीला है। वहाँ विक्रमादित्य के संग्रहालय में नवरत्नों की मूर्तियाँ स्थापित की गईl इस प्रकार जैन राजा विक्रमादित्य ने अपने योगदान से भारतीय इतिहास के साहित्य,ज्योतिष आदि सभी विधाओं को उन्नत किया,जिसके कारण हम उनके पदचिन्हों पर चल रहे हैंl धन्य हैं ऐसे महामानव,जिनकी देन से मानवता हमेश ऋणी रहेगीl

परिचय- डॉ.अरविन्द जैन का जन्म १४ मार्च १९५१ को हुआ है। वर्तमान में आप होशंगाबाद रोड भोपाल में रहते हैं। मध्यप्रदेश के राजाओं वाले शहर भोपाल निवासी डॉ.जैन की शिक्षा बीएएमएस(स्वर्ण पदक ) एम.ए.एम.एस. है। कार्य क्षेत्र में आप सेवानिवृत्त उप संचालक(आयुर्वेद)हैं। सामाजिक गतिविधियों में शाकाहार परिषद् के वर्ष १९८५ से संस्थापक हैं। साथ ही एनआईएमए और हिंदी भवन,हिंदी साहित्य अकादमी सहित कई संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। आपकी लेखन विधा-उपन्यास, स्तम्भ तथा लेख की है। प्रकाशन में आपके खाते में-आनंद,कही अनकही,चार इमली,चौपाल तथा चतुर्भुज आदि हैं। बतौर पुरस्कार लगभग १२ सम्मान-तुलसी साहित्य अकादमी,श्री अम्बिकाप्रसाद दिव्य,वरिष्ठ साहित्कार,उत्कृष्ट चिकित्सक,पूर्वोत्तर साहित्य अकादमी आदि हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-अपनी अभिव्यक्ति द्वारा सामाजिक चेतना लाना और आत्म संतुष्टि है।