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संवेदनशीलता नहीं, अब दिखावा

सीमा जैन ‘निसर्ग’
खड़गपुर (प.बंगाल)
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कितनी अजीब बात है न… कि दु:ख प्रदर्शित करने के लिए सच्ची संवेदना नहीं, आपकी उपस्थिति आवश्यक है… भले ही जीते जी आपने किसी रिश्तेदार को कभी वक्त न दिया हो…, कभी फोन पर हालचाल न पूछा हो…, कभी कोई जरूरी मदद न की हो, किंतु… किसी व्यक्ति के दुनिया से कूच करते ही सबसे पहले केवल १ दिन की उपस्थिति दर्ज कर आप जीत जाएंगे। सबसे जिम्मेदार, सबसे भले और सबसे बड़े हमदर्द साबित होंगे।

इस दिखावे की दुनिया में शुद्ध भावनाओं और लगाव की नहीं…, केवल चालाकी से रिश्ते निभाने की आवश्यकता है। आपको संवेदनशील नहीं… सिर्फ चालाक और मौके पर चौका जड़ने का जानकार होना अनिवार्य है।

जीते-जी किसी ने लाख मदद की हो, जिम्मेदारी निभाई हो, पर यदि अत्यावश्यक कार्य की वजह से अनुपस्थित हो जाए तो… उसे सबसे बड़ा गैर-जिम्मेदार घोषित कर दिया जाएगा। सभी क्षेत्र में जमाना घोर दिखावे का हो गया है… दिखावा चुस्त होना चाहिए, संवेदना आवश्यक नहीं है। आजकल सच्चे हमदर्द कहलाने की परिभाषा यही हो गई है।