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सबसे महंगी चीज ‘भरोसा’

डॉ. प्रताप मोहन ‘भारतीय’
सोलन (हिमाचल प्रदेश)
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सतरंगी दुनिया-३२…

‘गिरगिट’ ने आत्महत्या कर ली और सुसाईड नोट में लिखा-इंसान से ज्यादा मैं रंग नहीं बदल सकता। हमें हमेशा अपने लिए अच्छा सोचना चाहिए, क्योंकि गलत सोचने के लिए तो दुनिया बैठी है। कभी भी अफवाहों पर ध्यान मत दीजिए, क्योंकि अफवाह जलने वाले पकाते हैं, इसे मूर्ख परोसते हैं और बेवकूफ उसे खाते हैं। ‘सब्र का फल मीठा होता है’, इसी कहावत के चक्कर में मेरे २ सब्र के फलों की शादी हो गई और कल एक और की सगाई होने वाली है। जमाने का सच देखिए-“अफवाहें बिना पैर के दौड़ती है और सच लंगड़ाकर चलता है।
   अगर आपको उपवास करने का शौक है तो विचारों का करें, अगर भूखे रहने से भगवान खुश होते तो गरीब सबसे सुखी होते। आजकल रोटी गैस पर बनती है, इसलिए खाने के बाद पेट में गैस बनती है। आजकल रिश्तेदार भी बदल गए हैं, बचपन में जब वो हमारे घर आते थे तो पैसे देकर जाते थे। अब जब पैसों की जरूरत है, तो केवल आर्शीवाद देकर चले जाते हैं। यदि आप अपने खानदान का इतिहास सुनना चाहते हैं तो पत्नी के मायके की बुराई करें और पाएं अपने खानदान का गौरवशाली इतिहास सुनने का अवसर। ज़िंदगी का तजुर्बा यह कहता है कि साफ दिल रखने का सिर्फ एक ही नुकसान है, लोग आपको बेवकूफ समझकर हर बार आपका इस्तेमाल कर जाते हैं। ज़िंदगी में कोई अगर आपसे जलता है, तो उसे जलने दीजिए। याद रखिए, जलने वाली चीज हमेशा राख हो जाती है।
    मंदिर जाने से कुछ नहीं होगा, क्योंकि ‘चरण’ मंदिर तक पहुंचते हैं और ‘आचरण’ भगवान तक। यदि आप खुश रहना चाहते हैं, तो स्वयं का मूल्यांकन करें और हमेशा परेशान रहना चाहते हैं तो दूसरों का मूल्यांकन करें। यदि आपको जीवन का आनंद लेना है, तो अपने तरीके से लेना चाहिए। लोगों की खुशी के चक्कर में तो शेर को भी सर्कस में नाचना पड़‌ता है। ‘विनम्रता’ गुरुत्वाकर्षण के नियम को नहीं मानती। आदमी जितना नीचे झुकता है, उतना ऊपर उठता है। जुलाई माह का नाम जुलाई क्यों पड़ा ? एक शोधकर्ता के अनुसार -बरसात में नहाकर लड़कियाँ सिर में ‘जू’ लाई, इसलिए इस महीने का नाम जुलाई पड़ा।
   पुरुष और स्त्री में एक बहुत बड़ा अंतर होता है। पुरुष गुस्सा होने पर एकांत ढूंढते हैं, ताकि शांति मिल सके और स्त्री गुस्सा होने पर पति को ढूंढती है, ताकि लड़‌कर अपना गुस्सा शांत कर सके। देखिए, वक्त कैसे बदल गया है पहले हम किसी को रेलवे स्टेशन छोड़ने जाते थे, तो आँखें भर आती थी और इस समय तो श्मशान घाट में भी किसी की आँख नम नहीं होती है। आजकल सीजेरियन के बिना कोई बच्चा पैदा नहीं रोता है और बिना वेंटीलेटर के कोई मरता नहीं है। दूसरे का हक मारकर आप बादाम नहीं खा सकते, आपको दवाइयाँ ही खानी पड़ेगी। रिटायर पति को पत्नी समझा रही थी, कि तुम अब थोड़ा सेहत का ध्यान रखो और अपनी मूल भूख का ५० प्रतिशत ही खाया करो पेंशन की तरह। खामोश रहना सीखें, क्योंकि बातों से लोग नाराज बहुत होते हैं। जरूरी है ज़िंदगी में जिम्मेदारियों का भार होना, क्योंकि बिना वजन की नौका अक्सर दिशाहीन हो जाती है। इस दुनिया में ‘दु:ख’ हमारा परम मित्र है, यह हमसे ईश्वर की खोज करवाता है।
   बुढ़ापा हमारे जीवन की एक ऐसी अवस्था है, जब हमारे पास, हर प्रश्न का उत्तर होता है लेकिन प्रश्न पूछने वाला कोई नहीं होता। वो १ दिन छोड़कर पीते थे। कारण पूछने पर उन्होंने बताया कि रोज पीता था तो आदत बिगड़‌ती थी। रोज नहीं पीता था तो तबियत बिगड़ती थी। अब १ दिन छोड़कर पीता हूँ तो ‘तबियत’ और ‘आदत’ दोनों ठीक रहती है। जीवन में सबसे महंगी चीज भरोसा होता है, जिसे कमाने में कई साल लगते हैं और खोने में एक पल। मैंने कंडक्टर से पूछा-आप कितने घंटे बस में रहते हो ? उसने कहा-२४ घंटे। मैंने कहा- वो कैसे ? उसने बताया ८ घंटे तो सिटी बस में रहता हूँ और बाकी के १६ घंटे ‘बीबी के बस’ में रहता हूँ।
  बाप से डरने वाली हम आखिरी नस्ल हैं और औलाद से डरनेवाली पहली।
मेरे हिस्से की ज़िंदगी तेरे हिस्से में आए और तेरी मौत की मौत हो जाए।

परिचय-डॉ. प्रताप मोहन का लेखन जगत में ‘भारतीय’ नाम है। १५ जून १९६२ को कटनी (म.प्र.)में अवतरित हुए डॉ. मोहन का वर्तमान में जिला सोलन स्थित चक्का रोड, बद्दी (हि.प्र.)में बसेरा है। आपका स्थाई पता स्थाई पता हिमाचल प्रदेश ही है। सिंधी,हिंदी एवं अंग्रेजी भाषा का ज्ञान रखने वाले डॉ. मोहन ने बीएससी सहित आर.एम.पी.,एन. डी.,बी.ई.एम.एस., एम.ए., एल.एल.बी.,सी. एच.आर.,सी.ए.एफ.ई. तथा एम.पी.ए. की शिक्षा भी प्राप्त की है। कार्य क्षेत्र में दवा व्यवसायी ‘भारतीय’ सामाजिक गतिविधि में सिंधी भाषा-आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति का प्रचार करने सहित थैलेसीमिया बीमारी के प्रति समाज में जागृति फैलाते हैं। इनकी लेखन विधा-क्षणिका, व्यंग्य लेख एवं ग़ज़ल है। कई राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन जारी है। ‘उजाले की ओर’ व्यंग्य संग्रह प्रकाशित है। आपको राजस्थान से ‘काव्य कलपज्ञ’,उ.प्र. द्वारा ‘हिन्दी भूषण श्री’ की उपाधि एवं हि.प्र. से ‘सुमेधा श्री २०१९’ सम्मान दिया गया है। विशेष उपलब्धि-राष्ट्रीय अध्यक्ष (सिंधुडी संस्था)होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-साहित्य का सृजन करना है। इनके लिए पसंदीदा हिन्दी लेखक-मुंशी प्रेमचंद एवं प्रेरणापुंज-प्रो. सत्यनारायण अग्रवाल हैं। देश और हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार-“हिंदी को राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिले,हमें ऐसा प्रयास करना चाहिए। नई पीढ़ी को हम हिंदी भाषा का ज्ञान दें, ताकि हिंदी भाषा का समुचित विकास हो सके |