पद्मा अग्रवाल
बैंगलोर (कर्नाटक)
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जलवायु परिवर्तन, तापमान में वृद्धि, अनियमित मानसून, सूखते जलस्त्रोत और लुप्त होती जैव-विविधता के रूप में पर्यावरण की मुश्किलें आज हमारी चर्चा का मुख्य विषय बन चुकी हैं। ऐसी स्थिति में भगवान् कृष्ण का जीवन दर्शन हमें सिखाता है कि प्रकृति के साथ संतुलन बना कर जीवन जीना किसी तरह का त्याग नहीं है, वरन् बुद्धिमानी है।
सच तो यह है कि संपूर्ण पृथ्वी , इसका जल, वन, पर्वत और रहने वाले सभी प्राणी एक ही परिवार का हिस्सा हैं। भगवान् कृष्ण का संपूर्ण जीवन प्रकृति के साथ गहरे जुड़ाव का प्रतीक रहा है। जन्म से लेकर लीलाओं तक वन, नदी, पर्वत, गाय और पक्षी उनके जीवन के केंद्र में रहे। आज जब हमारा जीवन समस्याओं से घिरा हुआ है, ग्लोबल वार्मिंग, जल संकट और जैव विविधता के क्षरण से दुनिया जूझ रही है, तब कृष्ण का जीवन दर्शन पर्यावरण संरक्षण की सबसे व्यवहारिक शिक्षा देता है ।
कृष्ण केवल आध्यात्मिक मार्गदर्शक नहीं थे, वरन् दूरदर्शी थे जिन्होंने सदियों पहले ही मानव जाति को प्रकृति के साथ तालमेल करके जीने की शिक्षा दी थी।
एक ऐसा पाठ, जिसे आज विज्ञान ‘सस्टेनेबिलिटी’ से दोबारा खोज रहा है ।
प्रकृति पूजा में कृष्ण के जीवन की सबसे प्रतीकात्मक सीख गोवर्धन पूजा प्रसंग से मिलती है। जब पूरा ब्रज क्षेत्र इंद्र देव अर्थात् अदृश्य दूरस्थ शक्तियों की पारंपरिक पूजा में लगा था, तो कृष्ण ने एक अनोखे परिवर्तन का सुझाव दिया कि गोवर्धन पर्वत, वनस्पतियों और गोधन की पूजा की जाए। यह केवल धार्मिक अनुष्ठान का परिवर्तन नहीं था, वरन् यह सामाजिक और पारिस्थितिक संदेश था कि जो प्रकृति हम सबको प्रत्यक्ष रूप से भोजन, जल, वायु और आश्रय देती है, उसकी पूजा करना ही मनुष्य का सबसे पहला व्यवहारिक धर्म है।
इससे शिक्षा लेते हुए हमें भी कांक्रीट के जंगलों से अनियोजित निर्माण की बजाय पहाड़ों, जंगलों, तथा हरित क्षेत्रों के संरक्षण के सक्रिय कदम उठाने चाहिए।
यमुना नदी के कालिया नाग की कथा को आधुनिक दृष्टिकोण से देखें तो यह जल प्रदूषण का प्रतीकात्मक पहला बड़ा आंदोलन या कदम प्रतीत होता है। कृष्ण ने अकेले ही विष स्त्रोत का सामना किया, ताकि नदी का जल पुनः जीवनदायी बन सके और ब्रजवासी सुरक्षित जीवन जी सकें ।
आज हमारी नदियाँ औद्योगिक रसायनों, प्लास्टिक कचरे और सीवेज के गंदे पानी के बोझ तले दम तोड़ रहीं हैं। तब यह कथा हम सभी को संदेश देती है कि जल स्त्रोतों को स्वच्छ रखने की जिम्मेदारी हम सबकी है, क्योंकि हम सभी उसी जल पर जीवित हैं। नदी सफाई अभियान में भागीदारी, जल बर्बादी रोकना और औद्योगिक प्रदूषण के खिलाफ जागरूक आवाज उठाने से ही स्वच्छ जल और नदियों को विष से मुक्ति मिल सकती है।
भगवान् कृष्ण का जीवन इस बात का प्रमाण है कि पर्यावरण संरक्षण भारतीय संस्कृति सभ्यता की आत्मा में रचा-बसा मूल्य है। हमें इस पुरातन ज्ञान को आधुनिक कार्यों में बदलना है – छोटे ठोस और निरंतर प्रयासों के माध्यम से।
इस जन्माष्टमी व्यवहारिक पर्यावरण सिद्धांतों को दैनिक जीवन में उतार लें तो न केवल हमारी धरती सुरक्षित और हरी-भरी रहेगी, वरन् आने वाली पीढ़ियों को ऐसी विरासत मिलेगी, जिसने प्रकृति को अपना परिवार माना।