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समझ लो आजादी का मोल

माया मालवेंद्र बदेका
उज्जैन (मध्यप्रदेश)
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अपना सम्मान तिरंगा…

देश पर मरने वाले, अलहदा हुआ करते हैं,
भगत, लाल, आजाद जैसे देश पर मरा करते हैं
मैंने कब पिलाई दूध की वैसी घुट्टी,
दूध जीजा माँ के कर्ज के हुआ करते हैं।

तुमने तो नाम कर दी, नौनिहाली रंगीनियों के,
बंसती चोले, माँ भारती के लाल पहना करते हैं
संस्कार अब डीजे पर धिरकते हैं कैसे,
देश की धरती के लिए बावले नाच करते हैं।

समझ लो आजादी का मोल अभी भी,
हर सदी में मंगल, भगत, आजाद नहीं हुआ करते हैं
हममें से कौन है जो माँ भारती की शान बने,
हम तो बस अपने सम्मान पर मरा करते हैं।

मुझे कोई हक नहीं यह जुबां बोलने का,
मेरे भी शब्द कहाँ जो देश के लिए उफान भरते हैं
देश ने हमको बहुत दिया हमारी आजाद साँसों के लिए,
आओ हम भी देश के लिए बलिदान करते हैं।

आओ प्रण करते हैं एकजुट रहने का,
रखेंगे हम सदा एकता।
घर में चार दिवार सही,
दिल में हिंदुस्तान रखते हैं॥

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