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समाज के लिए यह सम्बन्ध ठीक नहीं

हेमराज ठाकुर
मंडी (हिमाचल प्रदेश)
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हिंदुस्तान के माथे पर आज एक और कलंक आफताब और श्रद्धा की ‘लिव इन रिलेशनशिप’ की कहानी के दर्दनाक अन्त से लगा है। आज के इस अंध आधुनिकता के दौर में हमारी युवा पीढ़ी पश्चिम की अति स्वतंत्र प्रिय सभ्यता को अपनाने में उतारू है और उसी पागलपन के नशे में बच्चे विपरीत लैंगिक होते हुए बिना विवाह किए ही पति- पत्नी की तरह इकट्ठा रहने लगे हैं। एक तो यह परम्परा भारतीय परिवारवाद और समाजवाद की दृष्टि में पहले ही भद्दा कर्म है। ऐसी वृति को हमारे यहां पशुवृति की संज्ञा शास्त्रों में दी गई है। उसके बावजूद भी यदि पश्चिमी सभ्यता के अंधानुकरण में नई पीढ़ी इस व्यवस्था में दैहिक विपासा के कारण रहना ही चाहती है, और इस व्यवहार को कोई पाश्विकता नहीं मानती, बल्कि पश्चिमी देशों के कानून की तर्ज पर इसे अपना कानूनी अधिकार समझती है तो इसमें समाज उनकी दुर्दशा के लिए कहां तक जिम्मेदार है ? खैर, यह घटना आज जिरह की नहीं है, बल्कि दिल को दहला देने वाली है। इस पर हर किसी को आफताब की करतूत पर गुस्सा आ रहा है और आना भी चाहिए। यह श्रद्धा की विकट मौत का ही वाक्य नहीं है, बल्कि हिंदुस्तान की हर जाति, धर्म और सम्प्रदाय की नौजवान बहू-बेटियों की सुरक्षा का सवाल है, पर बड़े दु:ख के साथ यह कहना पड रहा है कि आखिर क्या जरूरत है बिना शादी के लड़का-लड़की को सांसारिक व्यवहार में रहने की ? हमारी भारतीय संस्कृति की व्यवस्था के मुताबिक २५ वर्ष तक का समय पढ़ने-लिखने का है और उस बीच दो लड़का-लड़की में प्रेम भी हो जाता है, तो कोई गुनाह नहीं है। शर्त यह है कि, वह प्रेमी जोड़ा विवाह पूर्व शारीरिक संबंध स्थापित न करें। हमारी संस्कृति के नौजवान अधिकांश भले ही सामाजिक लाज- लपेट के चलते ही सही; इस नियम का पालन भी करते आए हैं। उसके पश्चात विवाह घर वालों की सहमति से करते हैं, और सांसारिक जीवन का आनंद लेते हैं। हमारी संस्कृति में बेटी जब एक बार ससुराल जाती थी, तो उसे शिक्षा दी जाती थी कि कभी ससुराल को छोड़ कर वापिस पीहर मत आना। वह बेटी भी उसी शिक्षा का पालन करती थी। युग बदला, परिस्थितियां बदली। अंग्रेज भारत में आए, उन्होंने भारतीय सामाजिक और वैवाहिक जीवन के ढर्रे को बदलने में अहम भूमिका निभाई। लोग दैहिक सुख को वैयक्तिक अधिकार समझने लगे। बड़े-बड़े घरानों के लोग इस बात को कोई बेगैरत नहीं, बल्कि रईसी रसूख समझने लगे। हमारी माताएं-बहनें औरत-देवी से ‘मैडम’ के पद पर पदच्युत हुई। उसी बीच ‘तलाक’ ने भी भारत में प्रवेश किया। भारत में यह अंग्रेजों की देन है, क्योंकि यह पश्चिम की रीत थी। वहां अत्यधिक स्वातंत्र्य के चलते शादी ज्यादा दिनों तक टिकती ही नहीं थी। यदि किसी की साल भर टिक गई तो, सालगिरह मनाई जाती थी और २५ साल टिकी तो रजत जयंती मनाई जाती थी। भारत में ये कोई भी प्रक्रम मौजूद नहीं थे। यहां शादी का नाम एक वचन था, जिसे एक पवित्र रिश्ता एवं जीवन यज्ञ समझा जाता था। हम इसे जीवनपर्यंत हर हाल में निभाते थे। बाहरी संस्कृतियों के संक्रमण ने हमारी संस्कृति और समाज का तरीका बदला। हम पश्चिम का अनुकरण करने लगे और आज तलाक, सालगिरह आदि रस्म समाज में आम प्रक्रियाएं हो गई हैं।
आज भले ही हमारे देश के कई विद्वान और व्यक्ति इस मुद्दे पर कड़ा कानून बनाने की बात कर रहे हों, पर ‘लिव इन रिलेशनशिप’ जैसे कानून को भारत में कोई जगह नहीं दी जानी चाहिए, क्योंकि हमारी सामाजिक और पारिवारिक व्यवस्था इतनी मजबूत और पवित्र है कि उसमें दम्पति से ले कर बच्चे और बूढ़े तक सुरक्षित है। यदि इस संबंध का कानून भारत में स्थान प्राप्त करता है तो भारतीय समाज हवस का शिकार हो जाएगा। न ही तो रिश्तों-नातों की अहमियत रहेगी, न ही नारी जाति का सम्मान रहेगा।भविष्य की नई पीढ़ी और वृद्ध लोग असहज और असुरक्षित होंगे तथा इस प्रकार श्रद्धा जैसी कई घटनाएं सामने आएगी। इसमें मात्र लड़कियां ही घटना की शिकार नहीं होगी, बल्कि लड़के भी इस लीव इस चंगुल में फंस कर शिकार होंगे। सभी जानते हैं कि एक वक्त के बाद अक्सर स्त्री-पुरुष, पति-पत्नी व्यवहार में रह कर एक-दूसरे से ऊब ही जाते हैं। वह तो हम लोक लाज और बच्चों की वजह से ताउम्र पति-पत्नी हो कर साथ रह लेते हैं और रहना भी चाहिए। यदि यह संबंध हमारे समाज पर हावी हुआ तो महिलाओं का और बच्चों का घना शोषण होगा। वह कैसे और क्यों ?, इसका जबाव समाज स्वयं जानता है। अधिकतर लोग विवाह से पूर्व ही देह भोग कर एक-दूसरे से ऊब कर किनारा कर लेंगे और यह सिलसिला समाज में आम हो जाएगा। नए नए साथी के साथ रहने का शौक स्त्री-पुरुष दोनों में जन्मेगा और सामाजिक ढांचा विकृत हो जाएगा। चरित्र नाम की बात बेईमानी हो जाएगी।