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सम्पन्नता-प्रगति के बाद विपन्नता आना सुनिश्चित

डॉ.अरविन्द जैन
भोपाल(मध्यप्रदेश)
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हमारे यहाँ यह कहावत है या मान्यता है कि, लक्ष्मी जी का वाहन उल्लू है। लक्ष्मी जी को दौलत भी बोलते हैं। लक्ष्मी आने पर मनुष्य में गरूर यानि घमंड आने लगता है, जो स्वाभाविक है। लक्ष्मी कभी किसी की दासी नहीं हुई है।
गरीब के यहाँ मिटने को कुछ नहीं होता है। उसके पास यदि धर्म, नीति और एकता हो, तब सब संभव है। वह अपनी गरीबी समता भाव से काट लेता है। कहा गया है-‘जहाँ सुमत तह सम्पत नाना, जहाँ कुमत तह विपद निदाना।’ वैसे सफलता और असफलता को ऐसा समझ सकते हैं, जैसे घड़ी का काँटा एक बार सबसे ऊपर जाता है, उसके बाद नीचे आता है। यानि एक बार सर्वोच्च पर और एक बार निम्मतर पर। सर्वोच्च पर पहुंचने वाले को गिरने का डर होता है, पर जो गिरा हुआ है उसे किस बात का डर ? हाँ, उसको ऊपर उठने का जरूर विश्वास रहता है।
यदि हम इतिहास को पलटें तो लक्ष्मी-प्रगति-विकास तीसरी पीढ़ी के बाद गिरती है और गिरे हुए की उठती है। इसके बारे में भारतीय दर्शन में कहा गया है कि, यह सब पुण्य-पाप का ठाठ होता है। आज पुण्य का उदय है तो मिटटी छुओ तो सोना होता है और जब पाप का उदय होता है तो सोना छुओ तो मिटटी होने लगता है। समय बहुत बलवान होता है। हर मनुष्य को अपने कर्म का दंड भोगना पड़ता है और कभी-कभी एक व्यक्ति के कारण बहुत बड़ा समूह रसातल में जाता है;उसका मुख्य कारण कर्मों का फल है। जैसे वर्तमान में एक पार्टी धरातल में जा रही तो दूसरी जो धरातल में थी, वह सर्वोच्च शिखर पर है।
कभी कभी हम किसी से लगाव रखते हैं और किसी से जलन-घृणा करते हैं, जबकि उस व्यक्ति का किसी से कोई व्यक्तिगत संपर्क नहीं है। इस बात को इस प्रकार समझना होगा कि, मेरे द्वारा किए गए कर्म ही मेरे मित्र हैं और किए गए कर्म ही मेरे शत्रु हैं। जो जैसे कर्म कर रहे हैं, उनका फल भी भोगना पड़ता है।

इसी प्रकार आजकल राजनीति-समाज में व्यर्थ-भाषणों के कारण वातावरण विषाक्त बना हुआ है। हम उसी जबान से किसी को सुकून दे सकते हैं, और उसी से दुश्मनी पाल सकते हैं, दण्डित होते हैं। यदि व्यर्थ की बकवास अच्छे लोग भी करने लगें तो भी अपने मान- और आदर को खो बैठेंगे।
भूल से भी दूसरे के सर्वनाश का विचार न करो, क्योंकि न्याय उसके विनाश की युक्ति सोचता है, जो दूसरे के साथ बुराई करना चाहता है।
दूसरे प्रकार के सब शत्रुओं से बचने का उपाय हो सकता है, पर पापकर्मों का कभी विनाश नहीं होता। वे पापी का पीछा करके उसको नष्ट किया बिना नहीं छोड़ते हैं। बस इसी प्रकार, पापकर्म पापी का पीछा करते हैं और अंत में उसका सर्वनाश कर डालते हैं।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में राजनीति में कटु शब्दों का प्रयोग और एक-दूसरे को नीचा दिखाने का चलन बहुत है। इससे वे बहुत अधिक दुखी हैं। यदि उनकी अंतरगता का पोस्टमार्टम किया जाए तो वे बहुत अधिक दुखी, भयाक्रांत दिखेंगे, और वे दिन-रात बुरे कर्मों का संग्रह कर रहे हैं और अंत में दंड भोगना निश्चित है।
राजनीति आदि में दिन-रात पाप का संचय करने के कारण जीव नरकगामी ही होता है। आज सत्ताधारी दल में बिखराव ज्यादा है।एकता मात्र भय और तानाशाही रवैय्या के कारण है। कहीं यह चरम उत्कर्ष के बाद निम्न स्तर पर आने का भय तो नहीं हैं!

परिचय- डॉ.अरविन्द जैन का जन्म १४ मार्च १९५१ को हुआ है। वर्तमान में आप होशंगाबाद रोड भोपाल में रहते हैं। मध्यप्रदेश के राजाओं वाले शहर भोपाल निवासी डॉ.जैन की शिक्षा बीएएमएस(स्वर्ण पदक ) एम.ए.एम.एस. है। कार्य क्षेत्र में आप सेवानिवृत्त उप संचालक(आयुर्वेद)हैं। सामाजिक गतिविधियों में शाकाहार परिषद् के वर्ष १९८५ से संस्थापक हैं। साथ ही एनआईएमए और हिंदी भवन,हिंदी साहित्य अकादमी सहित कई संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। आपकी लेखन विधा-उपन्यास, स्तम्भ तथा लेख की है। प्रकाशन में आपके खाते में-आनंद,कही अनकही,चार इमली,चौपाल तथा चतुर्भुज आदि हैं। बतौर पुरस्कार लगभग १२ सम्मान-तुलसी साहित्य अकादमी,श्री अम्बिकाप्रसाद दिव्य,वरिष्ठ साहित्कार,उत्कृष्ट चिकित्सक,पूर्वोत्तर साहित्य अकादमी आदि हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-अपनी अभिव्यक्ति द्वारा सामाजिक चेतना लाना और आत्म संतुष्टि है।

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