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सावन की रिमझिम

ताराचन्द वर्मा ‘डाबला’
अलवर(राजस्थान)
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सावन में बूंदों की रिमझिम,
सबके मन को भाती है
झूलों के संग हिल-मिल सखियां,
जीवन का राग सुनाती है।

गाती है मल्हार खुशी से,
वो फूली नहीं समाती है
ऐसे में सावन की रिमझिम,
प्रिय की याद दिलाती है।

वो देखो झरनों की कल-कल,
हृदय में उद्गार जगाती है
लहर-लहर लहराती फसलें,
आपस का द्वेष भुलाती है।

हँस-हँस के मकैई के दाने,
संदेश यही सुनाते हैं
आ जाओ तुम मिलकर सारे,
ग़म को अभी मिटाते हैं।

सावन में कोयल मतवाली,
मधुर संगीत सुनाती है
कूहू-कूहू की बोली से,
सबका मन बहलाती है।

खेतों में लहराती फसलें,
मन्द-मन्द मुस्काती है,
प्रेम करो आपस में सारे,
सबको ये सिखलाती है।

रिमझिम-सी पावस की बूंदें,
हृदय में प्रेम जगाती हैं।
सावन में मिट्टी की खुशबू,
अपनों की याद दिलाती है॥

परिचय- ताराचंद वर्मा का निवास अलवर (राजस्थान) में है। साहित्यिक क्षेत्र में ‘डाबला’ उपनाम से प्रसिद्ध श्री वर्मा पेशे से शिक्षक हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में कहानी,कविताएं एवं आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। आप सतत लेखन में सक्रिय हैं।