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साहस से ही संसार की राह

डॉ. आशा गुप्ता ‘श्रेया’
जमशेदपुर (झारखण्ड)
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साहस-उत्साह-हिम्मत….

साहस-उत्साह हर जीव के लिए एक आवश्यक मानसिक शक्ति, विचार या आत्म प्रदत्त भाव या बल है, जो शारीरिक बल में या परिस्थितियों में बलहीन होने पर भी व्यक्ति विशेष से बडे़-बडे़ कार्य करवाता है। यह हर व्यक्ति में अलग-अलग, हर बच्चे, युवा, बुजुर्ग, हर स्त्री-पुरूष के लिए विभिन्न रूपों में रहता है। जीवन पथ के हर क्षेत्र, संघर्ष, परीक्षा, कठिनाई, परेशानी, रोग-शोक और बिछड़न में इसकी आवश्यकता होती है। हर प्राणी के अंदर यह भाव और सामर्थ्य बनकर रहता है। कोई इसे समझता है, और किसी में इसे जगाना पड़ता है। असल में यह साहस, उत्साह कम या ज्यादा सबके भीतर रहता है। कहा जाए तो यह मानसिक शक्ति प्रत्यक्ष नहीं रहती, या स्वयं व्यक्ति विशेष इससे अनजान रहता है, जो परिस्थितियों में उभरती है। आदिम काल में मानव प्राणी अनेक विपरीत परिस्थितियों का सामना साहस से ही करते रहे एवं जीते और बढ़ते रहे। जैसे हिंसक पशुओं का सामना करना, तूफान भरे समुद्र में नाव खेना, जंगल में घूमना आदि- आदि। असल में हमारे आसपास यह साहस सबमें रहता है और हम सब इससे रूबरू होते रहते हैं। एक बच्चा जो चलना सीखता है, गिरता है, पर फिर उठकर चलता है। यह साहस ही है, जो बालपन में शुरू होता है। पढा़ई में परीक्षा में उतीर्ण ना होने पर स्वयं की मानसिक शक्ति को जगा, हार नहीं मान कर विद्यार्थी-छात्र-छात्रा तैयारी करते हैं, और उत्तम अंकों से उतीर्ण होते हैं, हताश होकर सिमटते नही हैं। ऐसे अनेक छोटे-बडे़ उदाहरण हैं।
जीवन कभी भी आसान नहीं होता, और उसे जीने के लिए साहस, उत्साह एक वरदान ही है। परिस्थितियाँ बदलती हैं, परेशानियाँ भी आती हैं। साहसिक उत्साहित व्यक्ति इन चुनौतियों से घबराता नहीं है, बल्कि डटकर सामना करता है। जब हम इतिहास के पन्नों को पलटते हैं, तो साहस-उत्साह-हिम्मत की अनेक गाथाएं पढ़ते हैं। साहसिक घटनाओं की कहानियाँ भी सुनते हैं। सतयुग, त्रेता युग, द्वापर युग के वीर पुरूष-नारियों की कहानियाँ, चंद्रगुप्त, रानी लक्ष्मीबाई, राणा प्रताप, नेताजी सुभाषचंद्र बोस आदि अनेक ऐसे अनगिनत नाम हैं। युद्ध में लगातार लड़ना, सेना की कमी होने पर भी जान हथेली पर ले लड़ जाना इत्यादि। स्वतंत्रता की लडा़ईयाँ, सच्चाई, न्याय के लिए विद्रोह और भूखमरी, प्रकोप जैसी विपरीत परिस्थितियों का सामना करना तथा अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना। ऐसे अनेक उदाहरण हैं, पर ये सभी किसी अनहोनी ताकत या जादूगरी से नहीं, बल्कि अपने साहस को जगाकर ही संभव हो पाया है। इसमें पर्वतारोहण करना, खेलों में भाग लेना, हारने पर भी फिर प्रयास करना इत्यादि हैं। शल्य क्रिया याने अपने शरीर पर किसी तरह के आपरेशन को कराने के लिए भी मरीज को अपने साहस और विश्वास को जगाना पड़ता है। आजकल के समय में भी आम व्यक्ति स्त्री या पुरूष, बालक, युवाओं के उत्साह से भरे साहसिक कार्य या प्रयासों के बारे में हम सब सुनते देखते रहते हैं।

शरीर का बल तभी साथ देगा, जब साहस और उत्साह जागृत होगा। यदि साहस ना होगा, तो व्यक्ति हताश-निराश होकर कमजोर होकर टूटने लगता है, और वो मानसिक परेशानी से ग्रसित भी हो सकता है। सारांश में कहें तो साहस एक ऐसी मानसिक शक्ति- उर्जा है, जिसकी जीवन के लिए सदा आवश्यकता है। मनुष्य के पास अनुपम मस्तिष्क है, और उसमें अद्म्य शक्तियाँ हैं। उनमें पंच इंद्रियों का संचालन और शारीरिक क्रियाओं के संचालन के साथ बुद्धि-विवेक के साथ प्रथम साहस की मानसिक शक्ति है। इसे समझना, जागृत रखना, सद्उपयोग मानव को उँचाईयों तक ले जाने की प्रथम सीढी़ है। साहसी मानव नकारात्मक स्थितियों का सामना करते हैं। जरूरत पड़ने पर मदद माँगते हैं। आविष्कारों को भी जन के सामने लाने के लिए साहस की आवश्यकता होती है। घर और विद्यालयों में बच्चों को इससे अवगत कराना-समझाना अवश्य चाहिए। जो कमजोर पड़ रहें हों, उनके साहस-उत्साह को जगाना चाहिए। नकारात्मक से सकारात्मक की राह विश्वास संग साहस ही जीवन का मंत्र बनता है। संसार उत्साहित साहसियों के आगे नत होता है, साहस से ही संसार की राह है।

परिचय- डॉ.आशा गुप्ता का लेखन में उपनाम-श्रेया है। आपकी जन्म तिथि २४ जून तथा जन्म स्थान-अहमदनगर (महाराष्ट्र)है। पितृ स्थान वाशिंदा-वाराणसी(उत्तर प्रदेश) है। वर्तमान में आप जमशेदपुर (झारखण्ड) में निवासरत हैं। डॉ.आशा की शिक्षा-एमबीबीएस,डीजीओ सहित डी फैमिली मेडिसिन एवं एफआईपीएस है। सम्प्रति से आप स्त्री रोग विशेषज्ञ होकर जमशेदपुर के अस्पताल में कार्यरत हैं। चिकित्सकीय पेशे के जरिए सामाजिक सेवा तो लेखनी द्वारा साहित्यिक सेवा में सक्रिय हैं। आप हिंदी,अंग्रेजी व भोजपुरी में भी काव्य,लघुकथा,स्वास्थ्य संबंधी लेख,संस्मरण लिखती हैं तो कथक नृत्य के अलावा संगीत में भी रुचि है। हिंदी,भोजपुरी और अंग्रेजी भाषा की अनुभवी डॉ.गुप्ता का काव्य संकलन-‘आशा की किरण’ और ‘आशा का आकाश’ प्रकाशित हो चुका है। ऐसे ही विभिन्न काव्य संकलनों और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में भी लेख-कविताओं का लगातार प्रकाशन हुआ है। आप भारत-अमेरिका में कई साहित्यिक संस्थाओं से सम्बद्ध होकर पदाधिकारी तथा कई चिकित्सा संस्थानों की व्यावसायिक सदस्य भी हैं। ब्लॉग पर भी अपने भाव व्यक्त करने वाली श्रेया को प्रथम अप्रवासी सम्मलेन(मॉरीशस)में मॉरीशस के प्रधानमंत्री द्वारा सम्मान,भाषाई सौहार्द सम्मान (बर्मिंघम),साहित्य गौरव व हिंदी गौरव सम्मान(न्यूयार्क) सहित विद्योत्मा सम्मान(अ.भा. कवियित्री सम्मेलन)तथा ‘कविरत्न’ उपाधि (विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ) प्रमुख रुप से प्राप्त हैं। मॉरीशस ब्रॉड कॉरपोरेशन द्वारा आपकी रचना का प्रसारण किया गया है। विभिन्न मंचों पर काव्य पाठ में भी आप सक्रिय हैं। लेखन के उद्देश्य पर आपका मानना है कि-मातृभाषा हिंदी हृदय में वास करती है,इसलिए लोगों से जुड़ने-समझने के लिए हिंदी उत्तम माध्यम है। बालपन से ही प्रसिद्ध कवि-कवियित्रियों- साहित्यकारों को देखने-सुनने का सौभाग्य मिला तो समझा कि शब्दों में बहुत ही शक्ति होती है। अपनी भावनाओं व सोच को शब्दों में पिरोकर आत्मिक सुख तो पाना है ही,पर हमारी मातृभाषा व संस्कृति से विदेशी भी आकर्षित होते हैं,इसलिए मातृभाषा की गरिमा देश-विदेश में सुगंध फैलाए,यह कामना भी है

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