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सुन लो मेरी करुण पुकार…

ताराचन्द वर्मा ‘डाबला’
अलवर(राजस्थान)
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विरह वेदना बढ़ रही है,
कैसे दिल अब धीर धरे
किसको मर्म का दर्द सुनाऊं,
जो कोई मेरी पीर हरे।

सूने-सूने नयन मेरे अब,
सूख गए है अंसुवन मोती
काँटों की सी सेज बनी अब,
पीड़ा उस पर मजे से सोती।

गईं मुस्कुराहट फूलों की,
शायद पथ पर मिट जाना है
जीवन के दीपों की ज्योति को,
अंधकार में बुझ जाना है।

हृदय भीतर विरह वेदना,
जीवन में अवसाद भरा है
मुरझा गए सब बाग-बगीचे,
जीने का अब स्वाद मरा है।

कैसे जग स्वीकार करेगा,
मेरी करुणा का उपहार।
बेसुध पड़े अरमान मेरे अब,
सुन लो मेरी करुण पुकार॥

परिचय- ताराचंद वर्मा का निवास अलवर (राजस्थान) में है। साहित्यिक क्षेत्र में ‘डाबला’ उपनाम से प्रसिद्ध श्री वर्मा पेशे से शिक्षक हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में कहानी,कविताएं एवं आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। आप सतत लेखन में सक्रिय हैं।

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