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सृष्टि और जीवन

रत्ना बापुली
लखनऊ (उत्तरप्रदेश)
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आना-जाना इस सृष्टि का, 
आओ बताएँ रहस्य गहरा
पंच तत्व की काया पर, 
दे रही ज्यों साँस पहरा।

बुद्धि का विवेक निशदिन, 
देता है मन को भाषण
कार्य सफल कर ले प्राणी, 
काल कवलित है यह जीवन।

सृष्टि मध्य जो दिख रहा, 
भ्रम है माया का बसेरा
अदृश्य हृदय से देख तू, 
कर्म है जिसका सबेरा।

कर्म को पैरों में बाँध,
नाचता लट्टू-सा जीवन
क्या बुरा व क्या भला, 
हरदम बिंधता मन ने प्रश्न।

प्रहर-सा जाता है बीत, 
जीवन समय का प्रवाह
बचपन, यौवन व बुढ़ापे का,
आवागमन होता अबाध।

चाहे लाख सँवारो यहाँ पर, 
अपनी कुटिया अपना बसेरा
तेरा नहीं कुछ भी यहाँ, 
मृत्यु का न कोई सबेरा।

जान कर भी अनजान बन, 
सब लगे हुए हैं बटोरने
चाहे इसकी खातिर हमको,
करने पड़ते झमेले कितने।

प्राणों का प्यारा रत्न, 
प्रेम को हम गए भूल
आपस की वैमनस्यता में,
बो रहे हैं कंटक-शूल।

न इस जग की हो पाई, 
न उस जग की सुनी पुकार
व्यर्थ में निज जीवन को, 
वासना से कर दिया बेकार।

स्वच्छ जीवन बचपन का,
जो मैं लाई थी नियति पार
उसमें दुनियावी रंग भरकर, 
कर दिया बे-रंग अपार।

निर्मल निश्छल और कंलकहीन, 
हो सकता था मेरा भी जीवन
पर हाय इस माया में फंसकर, 
मैंने कर लिया आत्म हनन।

सृष्टि व जीवन के मध्य,
चलता रहता अविरल नर्तन
एक पुरातन जाता है तो,
दूसरा आ जाता है नूतन।

सृष्टि का यह रहस्य समझ भी,
रहे हमारे हाथ ही रीते
पल दो पल जब साँसें बाकी, 
तभी क्यों आया भाव पुनीते।

मैंने तो गरल पिया इस जग का,
पर तुम न पीना मेरे भाई।
जैसा बीज बोया सबने, 
वैसी ही फसल सबने पाई॥

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