कुल पृष्ठ दर्शन : 324

You are currently viewing स्वभाषाओं का स्वागत लेकिन….?

स्वभाषाओं का स्वागत लेकिन….?

डॉ.वेदप्रताप वैदिक
गुड़गांव (दिल्ली) 
*******************************

यह खुश खबर है कि देश के ८ राज्यों के १४ अभियांत्रिकी महाविद्यालयों इंजीनियरिंग में अब पढ़ाई का माध्यम उनकी अपनी भाषाएँ होंगी। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति की पहली वर्षगांठ पर इस क्रांतिकारी कदम का कौन स्वागत नहीं करेगा ? अब बी.टेक. की परीक्षाओं में छात्रगण हिंदी,मराठी, तमिल,तेलुगु, कन्नड़, गुजराती, मलयालम और उड़िया आदि माध्यम से अभियांत्रिकी की शिक्षा ले सकेंगे। मातृभाषा के माध्यम का यह शुभ-कार्य यदि १९४७ में ही शुरु हो जाता और इसे कानून,गणित, विज्ञान,चिकित्सा आदि सभी पाठ्यक्रमों पर लागू कर दिया जाता तो इन ७ दशकों में भारत विश्व की महाशक्ति बन जाता और उसकी संपन्नता यूरोप के बराबर हो जाती। दुनिया का कोई भी शक्तिशाली और संपन्न देश ऐसा नहीं है,जहाँ विदेशी भाषा के माध्यम से पढ़ाई होती हो। हिरन पर घास लादने की मूर्खता सिर्फ भारत-जैसे पूर्व गुलाम देशों में ही होती है। इसके विरुद्ध डॉ. लोहिया ने जो स्वभाषा आंदोलन चलाया था,उसका मूर्त रुप अब देखने में आ रहा है़। ५०-५५ साल बाद अब क्रांतिकारी कदम उठाने का साहस भाजपा सरकार कर रही है। सरकार में दम और दृष्टि हो तो शिक्षा में से अंग्रेजी की अनिवार्य पढ़ाई पर कल से ही प्रतिबंध लगाए और देश के हर बच्चे की पढ़ाई उसकी मातृभाषा में ही हो। अंग्रेजी समेत कई अन्य विदेशी भाषाएं स्वेच्छया पढ़ने-पढ़ाने की सुविधाएँ विश्वविद्यालय स्तर पर जरुर हों लेकिन यदि शेष सारी पढ़ाई स्वभाषा के माध्यम से होगी तो यह निश्चित जानिए कि नौकरियों में आरक्षण अपने- आप अनावश्यक हो जाएगा। गरीबों,ग्रामीणों और पिछड़ों के बच्चे बेहतर सिद्ध होंगे। परीक्षाओं में अनुत्तीर्ण होने वालों की संख्या घट जाएगी। कम समय में ज्यादा पढ़ाई होगी। पढ़ाई से मुख मोड़ने वाले छात्रों की संख्या घटेगी। छात्रों की मौलिकता बढ़ेगी। वे नए-नए अनुसंधान जल्दी-जल्दी करेंगे, लेकिन भारत की शिक्षा का स्वभाषाकरण करने के लिए सरकार में अदम्य इच्छा-शक्ति की जरुरत है। रातों-रात दर्जनों पाठ्य-पुस्तकें,संदर्भ-ग्रंथ,शब्द-कोश,प्रशिक्षण शालाएँ आदि तैयार करवाने का जिम्मा शिक्षा मंत्रालय को लेना होगा। स्वभाषा में शिक्षण का यह क्रांतिकारी कार्यक्रम तभी अपनी पूर्णता को प्राप्त करेगा,जब सरकारी नौकरियों से अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त होगी। क्या किसी नेता या सरकार में दम है,यह कदम उठाने का?
यदि आपने संसद में,अदालतों में,सरकारी काम-काज में और नौकरियों में अंग्रेजी को महारानी बनाए रखा तो मातृभाषाओं की हालत नौकरानियों-जैसी ही बनी रहेगी। मातृभाषाओं को आप पढ़ाई का माध्यम जरुर बना देंगे लेकिन उस माध्यम को कौन अपनाना चाहेगा ?

परिचय– डाॅ.वेदप्रताप वैदिक की गणना उन राष्ट्रीय अग्रदूतों में होती है,जिन्होंने हिंदी को मौलिक चिंतन की भाषा बनाया और भारतीय भाषाओं को उनका उचित स्थान दिलवाने के लिए सतत संघर्ष और त्याग किया। पत्रकारिता सहित राजनीतिक चिंतन, अंतरराष्ट्रीय राजनीति और हिंदी के लिए अपूर्व संघर्ष आदि अनेक क्षेत्रों में एकसाथ मूर्धन्यता प्रदर्शित करने वाले डाॅ.वैदिक का जन्म ३० दिसम्बर १९४४ को इंदौर में हुआ। आप रुसी, फारसी, जर्मन और संस्कृत भाषा के जानकार हैं। अपनी पीएच.डी. के शोध कार्य के दौरान कई विदेशी विश्वविद्यालयों में अध्ययन और शोध किया। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त करके आप भारत के ऐसे पहले विद्वान हैं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय राजनीति का शोध-ग्रंथ हिन्दी में लिखा है। इस पर उनका निष्कासन हुआ तो डाॅ. राममनोहर लोहिया,मधु लिमये,आचार्य कृपालानी,इंदिरा गांधी,गुरू गोलवलकर,दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी सहित डाॅ. हरिवंशराय बच्चन जैसे कई नामी लोगों ने आपका डटकर समर्थन किया। सभी दलों के समर्थन से तब पहली बार उच्च शोध के लिए भारतीय भाषाओं के द्वार खुले। श्री वैदिक ने अपनी पहली जेल-यात्रा सिर्फ १३ वर्ष की आयु में हिंदी सत्याग्रही के तौर पर १९५७ में पटियाला जेल में की। कई भारतीय और विदेशी प्रधानमंत्रियों के व्यक्तिगत मित्र और अनौपचारिक सलाहकार डॉ.वैदिक लगभग ८० देशों की कूटनीतिक और अकादमिक यात्राएं कर चुके हैं। बड़ी उपलब्धि यह भी है कि १९९९ में संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। आप पिछले ६० वर्ष में हजारों लेख लिख और भाषण दे चुके हैं। लगभग १० वर्ष तक समाचार समिति के संस्थापक-संपादक और उसके पहले अखबार के संपादक भी रहे हैं। फिलहाल दिल्ली तथा प्रदेशों और विदेशों के लगभग २०० समाचार पत्रों में भारतीय राजनीति और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर आपके लेख निरन्तर प्रकाशित होते हैं। आपको छात्र-काल में वक्तृत्व के अनेक अखिल भारतीय पुरस्कार मिले हैं तो भारतीय और विदेशी विश्वविद्यालयों में विशेष व्याख्यान दिए एवं अनेक अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। आपकी प्रमुख पुस्तकें- ‘अफगानिस्तान में सोवियत-अमेरिकी प्रतिस्पर्धा’, ‘अंग्रेजी हटाओ:क्यों और कैसे ?’, ‘हिन्दी पत्रकारिता-विविध आयाम’,‘भारतीय विदेश नीतिः नए दिशा संकेत’,‘एथनिक क्राइसिस इन श्रीलंका:इंडियाज आॅप्शन्स’,‘हिन्दी का संपूर्ण समाचार-पत्र कैसा हो ?’ और ‘वर्तमान भारत’ आदि हैं। आप अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों और सम्मानों से विभूषित हैं,जिसमें विश्व हिन्दी सम्मान (२००३),महात्मा गांधी सम्मान (२००८),दिनकर शिखर सम्मान,पुरुषोत्तम टंडन स्वर्ण पदक, गोविंद वल्लभ पंत पुरस्कार,हिन्दी अकादमी सम्मान सहित लोहिया सम्मान आदि हैं। गतिविधि के तहत डॉ.वैदिक अनेक न्यास, संस्थाओं और संगठनों में सक्रिय हैं तो भारतीय भाषा सम्मेलन एवं भारतीय विदेश नीति परिषद से भी जुड़े हुए हैं। पेशे से आपकी वृत्ति-सम्पादकीय निदेशक (भारतीय भाषाओं का महापोर्टल) तथा लगभग दर्जनभर प्रमुख अखबारों के लिए नियमित स्तंभ-लेखन की है। आपकी शिक्षा बी.ए.,एम.ए. (राजनीति शास्त्र),संस्कृत (सातवलेकर परीक्षा), रूसी और फारसी भाषा है। पिछले ३० वर्षों में अनेक भारतीय एवं विदेशी विश्वविद्यालयों में अन्तरराष्ट्रीय राजनीति एवं पत्रकारिता पर अध्यापन कार्यक्रम चलाते रहे हैं। भारत सरकार की अनेक सलाहकार समितियों के सदस्य,अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विशेषज्ञ और हिंदी को विश्व भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए कृतसंकल्पित डॉ.वैदिक का निवास दिल्ली स्थित गुड़गांव में है।

Leave a Reply