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स्वार्थ छोड़ दे मानव

अजय जैन ‘विकल्प
इंदौर(मध्यप्रदेश)
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स्वार्थ छोड़ दे मानव,वरना मिट जाएगा तू,
फिक्र कर जरा धरा की,वरना रोएगा तू।

बर्बाद मत कर पेड़,पौधे,पर्यावरण यूँ,
अपने प्राण मत और खतरे में डाल तू।

जिससे सब-कुछ मिलता,मत कर उसे बंजर यूँ,
ये सब मिटा तो,बदले में छाँव कहाँ से लाएगा तू।

स्वार्थ की खातिर मत बन अंधा,कर चिंता ‘पर्यावरण’ की,
चल,वसुधा के आवरण को, फिर से हरा भरा बना तू।

जंगल,नदी,हवा बचा,कर इनकी पूरी रक्षा,
तस्वीर बदल जाएगी,जब बचाएगा पर्यावरण तू।

भस्मासुर मत बन,देख जरा प्रदूषण को,
दिला सबको यही पर्यावरण बचत संकल्प अब तू।

जीवन बचाने को तो लेनी होगी अब शपथ,
सब मिल खूब पेड़ लगायें,दिला संकल्प तू।

छील दिया है धरती को मानव ने अपने कर्मों से,
देशहित सोच,दूषित धरा पर पेड़ लगा कर,अब पुण्य कमा तू।

नीर रहेगा,धरा रहेगी,तो सबको साँस मिलेगी,
अब वसुधा को सब मिल महकाएँगे,ले संकल्प तू॥