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हवेली की दीवारें

रमेश चौरिया राही
कवर्धा (छत्तीसगढ़)
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ये रिसती दीवारें,
ये फटी-फटी दरारें।
अतीत को याद कर,
बहाती आँसू की धारें॥

मगर कुछ कह नहीं पाता,
अपनी कहानी,अपनी जुबानी।
बिन बोले बताता है,
देखो! आज इनकी निशानी॥

कभी गूंजती थी आवाजें,
हँसी और किलकारियाँ।
यहाँ पंछियों का बसेरा,
और पशुओं का तबेला॥

नौकर-चाकरों का,
होता था रेलम-रेला।
नहीं गूंजती ये दीवारें,
और नहीं चीखते ये बाड़े॥

कब बुझ गये कैसे ?
खुशियों के चिराग।
हवेली का खौफ़,
सिपाहियों का रौब,
दब गये कई राज॥

नहीं गूँजती ये दीवारें,
और नहीं चीखते ये बाड़े।
सपनों में खोये दिन-रात,
करते अतीत को याद॥

अपना वजूद मिटाने,
देखो! कैसे हैं बेकरार।
बस ढहने को तैयार,
अंतिम साँसें गिन रहा बार-बार॥

परिचय-रमेश कुमार चौरिया का उपनाम-राही है। जन्म तारीख १७ अप्रैल १९७२ और जन्मस्थान-कृतबाँधा(कवर्धा)हैl वर्तमान में कवर्धा (जिला-कबीरधाम,छत्तीसगढ़)में बसे हुए श्री चौरिया को हिन्दी और छत्तीसगढ़ी भाषा का ज्ञान है। छग वासी श्री चौरिया की शिक्षा-एम.ए. (समाज शास्त्र) एवं डी.एड. है। इनका कार्यक्षेत्र-शिक्षक (सरकारी शाला, भानपुर)है। लेखन विधा-गीत,कविता, ग़ज़ल एवं लघुकथा है। आपकी कुछ रचनाएँ पत्र-पत्रिकाओं में छपी हैं। राही की लेखनी का उद्देश्य-समाज हित एवं शौक है।