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हिंदी का सवाल:चरित्र का संकट

डॉ. धर्मवीर भारती
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भाषा और उसके बोलने वाले मनुष्य का संबंध अविच्छिन्न है। सच तो यह है कि, इतिहास के किसी विशिष्ट क्षण में किसी भाषा की प्रतिष्ठा के स्तर पर केवल इसलिए नहीं होती कि वह व्याकरण, लिपि, साहित्य- संपदा, दृष्टि से कितनी संपन्न है, इसलिए भी नहीं होती कि वह संख्या में कितने लोगों द्वारा बोली जाती है, उसकी प्रतिष्ठा मूलत: इस आधार पर हो पाती है कि जिनकी भाषा है जो उसे बोलते हैं उसमें तन कर खड़े हो सकने की रीढ़ है या नहीं, अपने जातिय स्वाभिमान की रक्षा करने के लिए आन है या नहीं, कितना साहस है, कितनी संवेदना है कितना मौलिक चिंतन है इतनी बौद्धिक जागरूकता पर अपने मूल्यों और अपनी आस्थाओं की कितना बलिदान दे सकने का माद्दा है। और सबसे अधिक यह है कि, अपने इस चरित्र-बल के साथ वे कितनी गहराई से अपने भाषा से जुड़े हैं। वस्तुतः, उनके आंतरिक चरित्र बल का भाषा के साथ जुड़ना भाषा को बहुआयामी गरिमा प्रदान करता है। इसी बिंदु पर आकर यह संबंध अन्योन्याश्रित हो जाता है। पुरानी उक्ति है ‘धर्म एवं हतो हन्ति, धर्मो रक्षति रक्षित:’, यानि ‘जो धर्म की हत्या करता है, वह स्वयं मारा जाता है और जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।’ यहां धर्म की जगह भाषा रख दें तो स्थिति वही रहती है। जो जाति भाषा की उपेक्षा करती है, वह स्वयं उपेक्षित हो जाती है और जो भाषा की रक्षा करती है, भाषा उसकी रक्षा करती है।
आज हिंदी का संकट यह नहीं है कि वह अविकसित भाषा है, यह नहीं है कि उसमें ज्ञान-विज्ञान की शब्दावली नहीं है, यह नहीं है कि बोलने वालों की संख्या कम होती जाती है, यह नहीं कि विधान में उसे उचित स्थान नहीं मिला हुआ है, उसका मूल संकट यह है कि हिंदीभाषी जन में आज चरित्र नहीं रह गया है। वह रागात्मक निष्ठा के बिंदु पर उससे कट चुकी है। परिणाम यह है कि सांस्कृतिक स्तर पर वह भाषा से कटा हुआ, पंख कटे पक्षी की तरह शून्य से तेजी से गिरता चला जा रहा है, और भाषा अनाथालय की हर ओर से दुत्कारी जाने वाली निर्दोष बच्ची की तरह दिनों-दिन कुंठित और असहज होती चली जा रही है।
कृपया, हो सके तो कुछ क्षण विचार भी करें।

(सौजन्य:वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुंबई)