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बच्चे फरमाइशों के

मयंक वर्मा ‘निमिशाम्’ 
गाजियाबाद(उत्तर प्रदेश)

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क्यों बेकार में लड़ती हो ?
क्यों नाहक झगड़ती हो ?
वो खेलने भी चले गए,
तुम अब तक अकड़ती हो।
मेरे-तुम्हारे के खेल में,
क्यों अपना खून जलाती हो।
बच्चों की बात में,
क्यों खुद बच्ची बन जाती हो।

न मेरे,न तुम्हारे और न हमारी ख्वाहिशों के,
ये बच्चे तो हैं बस,अपनी फरमाइशों के॥

कभी दादा की कुल्फी,अंगूर की बेल के,
कभी नाना के हवाई जहाज़,छुक-छुक रेल के।
कभी दादी के लड्डू,नोटों की पुड़िया के,
कभी नानी के दिए हुए गुड्डे और गुड़िया के।

न मेरे,न तुम्हारे और न हमारी ख्वाहिशों के।
ये बच्चे तो हैं बस,अपनी फरमाइशों के॥

कभी मेले में रो कर सबको दिखलाते हैं,
पापा नहीं,तो चाचा पर ज़ोर आज़माते हैं।
मेले के ठेले से पैर पटक कर चले आते हैं,
मानते हैं तभी,जब चाचा खिलौने दिलाते हैं।

न मेरे,न तुम्हारे और न हमारी ख्वाहिशों के,
ये बच्चे तो हैं बस,अपनी फरमाइशों के॥

तुमने शैतानी पर कान खींचे तो पापा के,
मैंने पढ़ाई पर डांटा तो लपककर मम्मा के।
इनके बदलते जवाबों में तुम मत बदलना,
मशगूल हो जाएंगे खुद में ये,साथ हमें है रहना।

न मेरे,न तुम्हारे और न हमारी ख्वाहहशों के,
ये बच्चे तो हैं बस अपनी फरमाइशों के॥

परिचय-मयंक वर्मा का वर्तमान निवास नई दिल्ली स्थित वायुसेना बाद (तुगलकाबाद)एवं स्थाई पता मुरादनगर,(ज़िला-गाजियाबाद,उत्तर प्रदेश)है। उपनाम ‘निमिशाम्’ है। १० दिसम्बर १९७९ को मेरठ में आपका जन्म हुआ है। हिंदी व अंग्रेज़ी भाषा जानने वाले श्री वर्मा ने बी. टेक. की शिक्षा प्राप्त की है। नई दिल्ली प्रदेश के मयंक वर्मा का कार्यक्षेत्र-नौकरी(सरकारी) है। इनकी लेखन विधा-कविता है। लेखनी का उद्देश्य-मन के भावों की अभिव्यक्ति है। पसंदीदा हिंदी लेखक व प्रेरणापुंज डॉ. पूजा अलापुरिया(महाराष्ट्र)हैं।

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