कुमारी ऋतंभरा
मुजफ्फरपुर (बिहार)
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हिंदी तुझे मेरा बंधन,
तन, मन, धन, जीवन अर्पण
ऐ हिंदी तुझे हर पल मैं लिखूं,
मेरे माथे की तू बिंदी, हिंदी।
क्या अब, क्या कल, क्या बरसों ?
जनम-जनम के जज्बात मैं लिखूं,
मेरे हिंदी तुझे हर बार लिखूं,
अपना मन, अपना स्वप्न लिखूं।
जीवन लिख दूं जन्म-जन्म लिख दूं,
हे हिंदी तुझे मैं हर बार लिखूं
मधुर मिलन के अनुराग लिखूं,
साजन के प्रेम की बात लिखूं
सजन से बिरह के जज्बात लिखूं।
शिव-पार्वती, सिया-राम, राधे-श्याम लिखूं,
मुरली वाले वृंदावन की प्रेम कथा लिखूं
हिंदी तुझे हर बार लिखूं,
नवग्रह से लेकर धरती की बात लिखूं
अपने प्रिय के प्रेम की हर रात लिखूं।
दर्द लिखूं अपने प्रेम के पागलपन को लिखूं,
कुछ दिन बीते कैसे उसके संग वह सब पल मैं लिखूं
अपने घर के अभाव लिखूं,
हर अनुभव, हर उम्र लिखूं
हिंदी तू मेरे देश का तिलक,
मेरी मूँछों की शान हिंदी।
कवियों के संग काव्य की बात लिखूं,
चेतक के टापू संग महाराणा की तलवार लिखूं
लक्ष्मी बाई की गाथा लिखूं,
हिंदुस्तान के लिए उसके त्याग लिखूं
हिंद की तू हिंदी है,
तेरी हर रग में हिंदी, हिंदुस्तान बसता है।
महाराणा प्रताप की साग की रोटी लिखूं,
पद्मावती की साहस की जुबानी लिखूं
सावित्रीबाई फुले के साहस मैं लिखूं,
हिंदी बता क्या मैं देश की पहली शिक्षिका की कहानी लिखूं,
भगतसिंह का साहस लिखूं
सुभाष की जवानी लिखूं,
अटल बिहारी जी की बातें लिखूं
या उनकी कविता के हर राग लिखूं।
स्वामी विवेकानंद के भाषण मैं लिखूं,
बिरसा मुंडा का साहस लिखूं
मांझी की रातों की हर रात लिखूं,
हिंदी बता, तुझे मैं अपना हर जज्बात लिखूं।
प्रियम की सुहानी रात लिखूं,
हिंदी तुझे हर जन्म की अपनी पहचान लिखूं
ऐ हिंदी बता तुझे क्या-क्या मैं लिखूं…॥