राधा गोयल
नई दिल्ली
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मेरे भाग्य विधाता (शिक्षक दिवस विशेष )…
हम भारतीयों के जीवन में गुरु का बहुत महत्व है। गुरु हमें उचित अनुचित का बोध कराते हैं। हर प्रकार की विधा में पारंगत करते हैं- फिर चाहे वो शस्त्र ज्ञान हो या शास्त्र ज्ञान। हमारे जीवन की लघुता को खत्म करके गुरुता से ऊर्जावान कर देते हैं। जो भी हमें ठीक ज्ञान दे,वही हमारा गुरु है। यूँ तो बहुत से गुरु हो सकते हैं, लेकिन सर्वप्रथम माँ ही पूर्ण गुरु है। तत्पश्चात गुरु ही पूर्ण माँ।
बच्चे की सबसे पहली और सबसे बड़ी गुरु उसकी माँ होती है। सारे वेद पुराणों ने माँ की महिमा का गुणगान किया है। उसके बाद विद्यालय में गुरु हमें शिक्षा देते हैं।
उसके बाद ज़िंदगी बहुत कुछ सिखाती है। जो ज़िंदगी सिखाती है, वो शायद कोई नहीं सिखा सकता है। ज़िंदगी हमें व्यवहारिक शिक्षा देती है, कदम-कदम पर इम्तिहान लेती है। इसकी कोई निश्चित तारीख या समय नहीं होता। अचानक ही इम्तिहान लेती है। संभलने का मौका तक नहीं देती। इतनी चुनौतियाँ और बाधाएँ पैदा करती है, कि कमजोर इन्सान तो हार मानकर बैठ जाए। इंसान मजबूत बन सके,इसलिए ज़िंदगी ऐसा करती है, ताकि जीवन में मुश्किलें आने पर व्यक्ति बिना घबराए धीरज से उनका मुकाबला कर सके। रास्ते के पत्थरों को मंजिल की सीढ़ियाँ बना ले और अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ता रहे और एक मिसाल कायम करे।
मैट्रिक में मुझे जीवन में एक ऐसे गुरु मिले, जिन्होंने मुझे एक पहचान दिलाई।
मुझे पढ़ने के लिए बड़े पापड़ बेलने पड़े। आठवीं कक्षा तक तो मुश्किल नहीं हुई, रैगुलर पढ़ाई की, पर उसके बाद पत्राचार माध्यम से पढ़ाई की। एक बार रास्ते में एक बैनर देखा, जिस पर लिखा था ‘आठवीं पास मैट्रिक करें।’ हमने वो बैनर देखकर आगे पढ़ने की हठ ठान ली।
कोचिंग इंस्टिट्यूट घर के नजदीक था। माता-पिता से बहुत खुशामद करके दसवीं कक्षा में दाखिला लिया। उन दिनों यह हाल था, कि जो भी पढ़ती थी, वह रट जाता था। कई बार तो अध्यापकों को यह लगता था कि मैंने वाकई रट्टा मारा है। एक बार उन्होंने मुझे एक पुस्तक दी और उसमें से एक पाठ पढ़ने के लिए कहा। मैंने ५ मिनट में ही पढ़ लिया। उन्होंने सुनाने के लिए कहा। मैंने पूरा सुना दिया। उन्हें लगा कि मैंने शायद यह पहले से ही पढ़ा हुआ होगा। बी.ए की कक्षा से एक पुस्तक ‘रश्मिरथी’ मँगाई गई। उसमें से एक अंश पढ़ने के लिए कहा। मैंने ५ मिनट में पढ़ लिया।उन्होंने सुनाने के लिए कहा। मैंने पूरा सुना दिया। उन्हें लगा मैंने शायद यह भी पहले से ही पढ़ा होगा। उन्होंने एम.ए की कक्षा से ‘यशोधरा’ नामक पुस्तक मँगाई और उसमें से एक कविता पढ़कर सुनाने के लिए कहा। मैंने ५ मिनट में ही पढ़कर सुना दिया। सब बहुत हैरान हुए और बोले कि “कौन – सी चक्की का पिसा हुआ आटा खाती हो ?”
मैंने कहा-“हमारी अपने ही घर की चक्की है।”
उन्होंने कहा, कि” तुम्हारा दिमाग इतना तेज है कि तुम्हारी स्कॉलरशिप आ सकती है। यदि तुम्हारी स्कॉलरशिप आ गई तो मैं तुम्हें ₹६० का इनाम दूँगा।” यह बात सन् ६२ की है। मेरी स्कॉलरशिप आई।
ऐसा ही एक और किस्सा हुआ। मैंने एक नाटक की मोनो एक्टिंग की थी। नाटक को केवल एक बार पढ़ा था और संवाद याद हो गए थे। उन्हें एक्टिंग बहुत पसंद आई और मुझे ₹ २ इनाम के तौर पर दिए। घर में आकर बहुत खुश होकर पिताजी को यह बात बताई। इतनी डाँट पड़ी कि कुछ पूछो ही मत। पिताजी ने कहा कि तुमने अपनी कला को बेच दिया है। क्या तुम नट हो, जो कला बेचकर पैसे कमा रहे हो ? यदि उन्हें इनाम ही देना था तो कोई किताब भी दे सकते थे। यह पैसे कल ही स्कूल में जाकर वापस करना। मैंने स्कूल में जाकर पैसे वापस किए और घर में पड़ी डाँट का विस्तारपूर्वक वर्णन कर दिया। उन्होंने मुझसे ₹२ ले लिए और मुझसे पूछा कि “बताओ तुम्हें कौन- सी किताब चाहिए ? ‘गीतांजलि’ या कोई अन्य पुस्तक ?”
मैं चुप रही और सोचा कि जैसी पुस्तक ठीक समझेंगे, अपने आप दे देंगे।
सन् १९६२ में मैट्रिक में ८० फीसदी अंकों से प्रथम स्थान प्राप्त किया। गुरु जी ने कहा, कि “तुम्हारा ग्यारहवीं में वजीफा आ सकता है।” लेकिन फिर पढ़ाई की बंदिश। लाख खुशामद करने के बाद भी कोई हल निकलता नजर नहीं आ रहा था। भला हो हमारे गुरु जी का। उन्होंने घर पर बार-बार लड़कियों को भेजा। उन्होंने बताया कि गुरु जी ने भेजा है। कहा है कि आप अपनी बेटी को आगे क्यों नहीं पढ़ा रहे हो ? यह लड़की कुशाग्र बुद्धि की है।आपका नाम रोशन करेगी। गुरु जी ने आपको स्कूल में बुलाया है।”
शुक्र है, कि माता-पिता मान गये और मैंने हायर सेकंडरी में दाखिला लिया। उसमें पूरी दिल्ली में प्रथम स्थान प्राप्त किया। यूनिवर्सिटी की मैग्ज़ीन में फोटो और परिचय भी प्रकाशित हुआ। स्कॉलरशिप भी मिली।
किसी स्कूल में गज़ट आया था। हमारे गुरु जी ने कुछ लड़कियों के साथ मुझे उस विद्यालय में जाकर गज़ट में अपना नाम देखने के लिये भेजा। सही मायने में तो उन्हें दिखाना था कि यह हमारे स्कूल की छात्रा है, जो पूरी दिल्ली में प्रथम आई है। उसके बाद अखबार में देने के लिए मेरा फोटो खिंचवाया। गुरुजी के कारण मुझे आगे पढ़ने का अवसर मिला और एक नई पहचान मिली। मेरा फोटो उन्होंने अपने ऑफिस में लगवाया। सबको बताते थे कि यह हमारे संस्थान की छात्रा है, जो पूरी दिल्ली में प्रथम आई है। यहाँ तक कि एक बार विवाह के बाद अपनी एक साल की बेटी को लेकर किसी की शादी में गई थी। संस्थान वहाँ से बहुत पास था। उसे देखने का मोह संवरण नहीं कर पाई। वहाँ गुरु जी मुझे सभी कक्षाओं में ले गए और सबको बताया कि ऑफिस में जिस लड़की की फोटो है, वह ये है-इस संस्थान की शान।
धन्यवाद गुरु जी, एक नई पहचान दिलाने के लिए। आपका सहयोग नहीं मिलता तो मैं इस सौभाग्य से वंचित रह जाती। अब अपने नाती-पोतों को अपनी उपलब्धियाँ (वो मैग्ज़ीन, मेरा परिचय, फोटो और स्कॉलरशिप के लिए यूनिवर्सिटी द्वारा भेजे गए पत्र) दिखाती हूँ तो उन्हें मुझ पर बड़ा गर्व होता है। यह सब गुरु जी के कारण ही संभव हो सका।