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१९६५ की देशभक्ति और प्रदर्शनी

राधा गोयल
नई दिल्ली
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यादों के झरोखे से…

१९६५ में भारत और पाकिस्तान में युद्ध छिड़ा हुआ था। मैं उन दिनों उषा सिलाई स्कूल में सिलाई- कढ़ाई का प्रशिक्षण ले रही थी। उस समय लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री थे। उन्होंने देश के लोगों में देशभक्ति का ऐसा जज्बा पैदा कर दिया था कि महिलाओं ने अपने आभूषण तक देश की रक्षा के लिए दे दिए थे। मुझमें बचपन से ही देशभक्ति का जज्बा कूट-कूट कर भरा हुआ था तो मैंने सोचा कि हमें भी देश के लिए कुछ करना चाहिए,पर क्या ?
‘चाह हो तो राह भी मिल ही जाती है।’ यही समझकर मैंने अपनी प्रिंसिपल से कहा कि मैडम क्यों न हम शाला में कपड़ों की प्रदर्शनी लगाएं ? उससे जो पैसा आएगा,वह हम प्रधानमंत्री राहत कोष में जमा करा देंगे। मैडम मुझ पर ज्यादा ही कृपालु रहती थीं और मुझे बुद्धिमान भी समझती थीं,क्योंकि जो ड्राफ्टिंग अन्य छात्राओं को सप्ताह में केवल एक बार देती थीं और एक सप्ताह में भी वे लोग उस डिज़ाइन को पूरा नहीं कर पाती थीं,मैं अगले दिन ही पूरा करके ले जाती थी,और वह उसमें कोई कमी भी नहीं निकाल पाती थीं। शायद इसीलिए उनकी नजरों में मैं श्रेष्ठ शिक्षार्थियों की श्रेणी में आती थी। मैडम को मेरी बात पर पूरा यकीन था,लेकिन यह होगा कैसे ? यह सवाल उनके मन में था।
मैंने कहा,-‘मैडम आप केवल अनुमति दे दें। बाकी सब कुछ मुझ पर छोड़ दें। बस इन छात्राओं से केवल इतना कह दें कि अपने घर से जितने भी छोटे-बड़े कपड़ों के टुकड़े हैं,लेकर आएँ।’
उन्होंने सबको वैसा ही आदेश दे दिया। वैसे भी वहाँ पास में ही बाजार था,जहाँ कपड़ों की ढेर दुकाने थीं। सिलाई सीखने वाली लड़कियाँ वहीं से छोटे कपड़े बनाने के लिए कटपीस खरीदती थीं।
अनुमति मिलने के बाद मैंने योजनानुसार काम करना शुरू किया। चार्ट पेपर काटकर छोटे-छोटे टिकट बनाए और उन पर ₹ १० दाम लिखा। विद्यालय के आस-पास बहुत सारी दुकानें और शो-रूम थे। सबको यह कहकर टिकट दिए कि १५ दिन बाद हम अपने विद्यालय में सिले हुए कपड़ों की प्रदर्शनी लगाएँगे और उससे जो पैसा इकट्ठा होगा,वह प्रधानमंत्री राहत कोष में जमा करेंगे। आपसे उम्मीद करते हैं कि देश की खातिर ₹ १० का टिकट तो आप लोग खरीद ही सकते हो। मात्र २ दिन में ₹ १००० इकट्ठे हो गए और हमारी प्रिंसिपल ही एकमात्र ऐसी थीं,जो किसी शाला की तरफ से प्रधानमंत्री राहत कोष में ₹ १००० जमा करवा कर आईं थीं। शाला में आकर उन्होंने मेरी पीठ थपथपाकर शाबाशी दी। अब उन्हें विश्वास हो गया कि मैं प्रदर्शनी का काम भी कर पाऊँगी।
एक कपड़े वाले की दुकान से बहुत छोटे-छोटे बचे हुए टुकड़े भी मुफ्त में ले आई थी। उसको टिकट दिया था और कहा था कि जो २०-३० इंच के कटपीस तुम्हारे किसी काम के नहीं हैं और जिन्हें तुम कौड़ियों के मोल बेचते हो,हम उनके कपड़े सिलकर प्रदर्शनी लगाएँगे और वह पैसा प्रधानमंत्री राहत कोष में देंगे। जो सैनिक देश की रक्षा के लिए…हमारी रक्षा के लिए…अपने प्राण हथेली पर रखकर बैठे हैं,हमारा भी फ़र्ज है कि हम उनके लिए कुछ करें। आप यह बेकार कपड़े हमें दे देंगे तो आपका कोई नुकसान नहीं होगा,बल्कि देश के लिए एक योगदान होगा। दुकानदारों ने काफी सारे कपड़े दे दिए। छात्राएँ भी अपने-अपने घर से कपड़े ले आईं। उन कपड़ों से मैंने ए लाइन,अंब्रेला कट,कोट फ्रॉक,फ्रॉक रोम्पर,झबले,टी शर्ट,स्कर्ट… रंग-बिरंगे कपड़े लगाकर कढ़ाई करके बनाईं।
घर में आज तक किसी को इस बात का पता नहीं है कि मैंने यह सब कुछ किया। यदि पता लग जाता तो मैं किसी भी दुकान पर टिकट देकर ₹ १००० इकट्ठे नहीं कर पाती और न ही प्रदर्शनी लगा पाती।
जितने कपड़े हमारे पास थे,वह सब सिल गए तो बारी आई प्रदर्शनी लगाने के लिए बाकी सामान की। मसलन बाँधने के लिए रस्सी,लटकाने के लिए हैंगर,चिमटियाँ बल्ब व बैनर इत्यादि। शाला के बराबर में ही ड्राईक्लीनर की दुकान थी। उससे सैनिकों का और देश का हवाला देकर मुफ्त में हैंगर लेकर आई। पहले तो आनाकानी कर रहा था। उसको समझाया कि दो दिनों में तुम्हारे हैंगर यदि हम इस्तेमाल कर लेंगे तो न तो तुम्हारा कुछ बिगड़ेगा न ही इन हैंगरों का कुछ बिगड़ेगा बल्कि किसी की जिंदगी जरूर संवर जाएगी। तुम्हारे हैंगर तीसरे दिन बाइज्जत वापस मिल जाएँगे। ऐसे ही एक दुकान से रस्सी,एक से चिमटियाँ,एक से बल्ब आदि लाकर ढंग से कपड़े सजाए। रविवार के दिन प्रदर्शनी लगाई। हालाँकि उस दिन बहुत बारिश हो रही थी,पर घर में हमने पहले से ही कह रखा था कि हमें रविवार को विद्यालय जरूर जाना है क्योंकि हमारी मैडम ने हमारे द्वारा सिले गए कपड़ों की प्रदर्शनी लगवानी है।
हम रविवार को विद्यालय गए। काफी दुकान वाले इस प्रदर्शनी में आए। जो कपड़े उन्हें अच्छे लगे,वे मुँहमांगे मूल्य पर उन्होंने खरीद लिए। एक ही दिन में ₹ ५००० इकट्ठे हो गए,जिन्हें हमारी प्रिंसिपल दोबारा प्रधानमंत्री राहत कोष में जमा करा आईं। अगले दिन हमने…यानी कि मैंने हैंगर वाले के हैंगर,चिमटी वाले की चिमटियाँ,रस्सी वाले की रस्सी बल्ब वाले का बल्ब…आभार सहित सबका सामान वापस किया। सबका एक ही कहना था कि-“बिटिया तुमने हमारी आँखें खोल दीं। इसमें आभार किस बात का। तुम बच्ची होकर इतना कर सकती हो। आभार तो हमें तुम्हारा मानना चाहिए।तुमने हमें सिखाया कि सैनिक हमारी रक्षा के लिए अपनी जान की बाजी लगा रहे हैं तभी हम आराम से अपनी रोजी-रोटी कमा पा रहे हैं। बिटिया धन्य है वह माँ-बाप जिन्होंने तुम्हें पैदा किया। भगवान तुम्हारे जैसी बेटी हर किसी को दे।”
मेरी प्रिंसिपल तो मुझसे इतनी खुश थीं कि उन्होंने स्कूल के हेड ऑफिस तक यह समाचार भेजा। उषा सिलाई स्कूल की उन दिनों कई शाखा थीं। जब परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद प्रमाण-पत्र दिए गए तो मेरा प्रमाण-पत्र स्वयं शाखा प्रबंधक ने आकर दिया। साथ यह भी कहा कि भविष्य में कभी स्कूल खोलने का इरादा हो तो हमसे संपर्क करना। सारी व्यवस्था…जैसे मशीन वगैरह मुहैया कराना हमारा काम होगा। हम तुम्हें वेतन भी देंगे।
जब हम विकासपुरी में रहने आ गए थे तब संयोग से शाखा प्रबंधक से भेंट हुई और वे मुझे पहचान गईं। उन्होंने हमारा घर देखा और कहा कि यहाँ तो तुम अच्छा भला स्कूल चला सकती हो। स्कूल चलाने के लिए जो भी सामान चाहिए,वह सब हम दे देंगे। मैं सरकारी नौकरी करती थी,इसलिए उनके प्रस्ताव को स्वीकार करने में असमर्थ थी। एक बात और-मैंने अपनी कविताओं के एकल संकलन ‘काव्य मंजरी’ में एक कविता लिखी है, जिसका शीर्षक है-‘इसीलिए ही बोरी ओढ़ के आई हूँ।’ हमारे विद्यालय में एक लड़की बिल्कुल ऐसी थी। किसी ने कहा,इस पर कविता लिख दे। मैंने उस पर कविता लिख दी और सुना दी। सब हँसते-हँसते लोट-पोट हो गए। सप्ताह में एक दिन जरूर वही कविता सुनाने का आग्रह करते थे और इतना हँसते थे कि हँसते-हँसते हाॅल में ही पसर जाते थे। सबको हँसी इसलिए आती थी क्योंकि उस कविता में उस छात्रा का वास्तविक चित्रण है। हमें भी इतनी समझ नहीं थी कि मैं उस पर कविता न लिखूँ। बस लिखना शुरू किया पर लेखनी कविता समाप्त होने पर ही रुकी।